मुझे मंज़िल नहीं, सफ़र का आनंद चाहिए।

अजीब फ़कीरी है अब हमारे मिज़ाज में...

न किसी से आगे निकलने की चाहत,
न किसी को पीछे छोड़ने का जुनून।

न दुनिया को खुश करने की कोशिश,
न ख़ुद को अच्छा साबित करने का शौक़।

जिसे रहना है, प्रेम से रहे...
जिसे जाना है, मुस्कुराकर जाए।

हमने तो अब ज़िंदगी से बस इतना कहा है—

**मुझे मंज़िल नहीं, सफ़र का आनंद चाहिए।
मुझे भीड़ नहीं, भीतर का उत्सव चाहिए।** ❤️🌿

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