विनम्बर श्रद्धांजलि🙏
1940 में मेहबूब ख़ान अपनी फ़िल्म "औरत" बना रहे थे, जिसमें एक अधेड़ उम्र के बेरहम साहूकार सुखीलाला का किरदार निभाना था। शूटिंग के दिन एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई — कोई भी मेकअप आर्टिस्ट इस किरदार के लिए उपलब्ध या तैयार नहीं था। अभिनेता ख़ुद परेशान हो गया, मगर छायाकार फ़रेदून ईरानी ने बड़ी सहजता से कहा — "फ़िक्र मत करो, बस जैसे हो वैसे ही आ जाओ, मैं तुम्हें बिना मेकअप के ही फ़िल्मा लूंगा।" अभिनेता ने बस एक मूंछ लगाई, और बाक़ी कुछ नहीं — कोई मेकअप नहीं, कोई बनावट नहीं। यह परफ़ॉर्मेंस इतनी असरदार और सच्ची रही कि फ़िल्म गोल्डन जुबली हिट बन गई। सत्रह साल बाद, जब मेहबूब ख़ान ने इसी फ़िल्म को "मदर इंडिया" (1957) के नाम से दोबारा बनाया, तो उन्होंने इसी अभिनेता को दोबारा सुखीलाला के किरदार में लिया — हिंदी सिनेमा के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि किसी अभिनेता ने इतने लंबे अंतराल के बाद वही किरदार दोबारा निभाया। यह अभिनेता थे कन्हैयालाल, जिनकी सादगी भरी, बिना बनावट वाली अदाकारी ने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार खलनायकों में शुमार कर दिया। आज कन्हैयालाल ...