सच में बहुत नॉस्टैल्जिक!*
दोस्तों, मुझे यह बहुत पसंद आया और यह बिल्कुल सच है 🧅 *बिना स्टेरलाइज़्ड, बिना माफी मांगने वाली पीढ़ी के लिए एक कविता* मेरी माँ एक ही चाकू ऐसे चलाती थीं जैसे विश्वकर्मा का ब्लेड हो— टमाटर, धनिया, मक्खन की फौज। कोई अलग बोर्ड नहीं, कोई साफ-सफाई के नियम नहीं, फिर भी हम ज़िंदा रहे—न पेट फूलना, न एम्बुलेंस की लाइटें। हमारे सैंडविच रीसायकल किए हुए कवर में होते थे— ब्रेड का वैक्स पेपर, चाय की पन्नी। ई. कोलाई, फैटी... नहीं, कभी नहीं, हमने खाया, हम दौड़े, हम हँसे, एक स्वस्थ लिवर के साथ। हम कहानियों के योद्धाओं की तरह कीटाणुओं के बीच साइकिल चलाते थे, सड़कों, लॉन, कंकड़ पर खूब खेलते थे। मिट्टी के बर्तन बनाते थे, सुंदर मूर्तियाँ बनाते थे, कोई डेटॉल वाइप्स नहीं, फिर भी हम ठीक महसूस करते थे। पी.टी. के जूते—कैनवस के, किस्मत की तरह सपाट, ऊँचा उठाने के लिए कोई एयर-कुशन सोल नहीं। हम दौड़े, हम गिरे, हमें चोट लगी, हम ठीक हुए, कभी कोई ऑर्थोपेडिक ड्रामा सामने नहीं आया। छड़ी, डस्टर, सच्चाई का थप्पड़— अनुशासन दुर्व्यवहार नहीं था, यह जवानी थी। हम बड़ों के सामने झुकते थे, न कि ट्रॉमा चार्ट के सामने, इज्ज़त कमाई...