प्रेम क्या है????
प्रेम कोई भावना नहीं है, यह तुम्हारा स्वभाव है। जब तुम प्रेम में होते हो, तब तुम मांगते नहीं… तुम स्वयं प्रसाद बन जाते हो। मंदिरों में जो प्रसाद मिलता है, वह बाहर से आता है। लेकिन प्रेम का प्रसाद भीतर से फूटता है— और जो भीतर से आता है, वही सत्य है, वही दिव्य है। लोग भगवान को ढूंढते हैं पत्थरों में, शब्दों में, विधियों में… पर जिसने प्रेम को जान लिया, उसने पाया— भगवान कोई व्यक्ति नहीं, एक अनुभव है… और वह अनुभव प्रेम है। इसलिए — प्रेम से बड़ा कोई प्रसाद नहीं, क्योंकि इसमें देने वाला भी मिट जाता है, पाने वाला भी… और जो शेष बचता है, वही प्रेम है। 💞