मुकदमा...कुछ अलग
" अदालत में पहली बार ऐसा मुकदमा आया... जहाँ तीनों बेटे ज़मीन नहीं, अपने बूढ़े माँ-बाप को अपने साथ ले जाने की ज़िद कर रहे थे।" जिला न्यायालय का कमरा नंबर 7 लोगों से खचाखच भरा हुआ था। बाहर खड़े लोग एक-दूसरे से पूछ रहे थे— "किस बात का केस है?" किसी ने जवाब दिया— "सुना है तीनों बेटे लड़ रहे हैं..." एक आदमी हँसकर बोला— "फिर वही ज़मीन-जायदाद का झगड़ा होगा।" तभी कोर्ट का दरवाज़ा खुला। अंदर जो दृश्य था, उसने सबकी सोच बदल दी। कटघरे में कोई अपराधी नहीं खड़ा था। वहाँ बैठे थे सत्तर वर्षीय रामस्वरूप मिश्रा और उनकी पत्नी सरला देवी। दोनों की आँखों में आँसू थे। उनके सामने खड़े थे उनके तीनों बेटे— विनय, दीपक और मोहित। जज ने फाइल खोली और मुस्कुराकर पूछा— "तो बताइए... विवाद क्या है?" सबसे बड़े बेटे विनय ने हाथ जोड़कर कहा— "माननीय न्यायालय... मैं अपने माता-पिता को अपने साथ रखना चाहता हूँ।" जज ने दूसरे बेटे की ओर देखा। दीपक बोला— "नहीं साहब... पिछले दस साल से बड़े भैया ने सबसे ज़्यादा सेवा की है। अब मेरी बारी है। मैं उन्हें अपने घर ले जाना चा...