हमारा युवा पीढ़ियां बदल रहा है
“ हत्या सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं होती… उसके साथ कई परिवार उम्र भर के लिए मर जाते हैं।” पिछले कुछ समय से लगातार ऐसी ख़बरें सामने आ रही हैं जहाँ किसी लड़की ने अपने मंगेतर या पति की हत्या कर दी। हर घटना के बाद हम किसी एक व्यक्ति को खलनायक बना देते हैं, सोशल मीडिया अदालत बन जाता है, और कुछ दिनों बाद अगली ख़बर आ जाती है। लेकिन क्या हम कभी ठहरकर यह सोचते हैं कि ऐसी त्रासदियों की शुरुआत कहाँ से होती है? मुझे लगता है कि कहीं न कहीं हम माता-पिता भी इस कहानी का हिस्सा हैं। दोषी नहीं, लेकिन ज़िम्मेदार ज़रूर। हमें यह स्वीकार करना होगा कि बच्चों को जन्म देना, उन्हें पढ़ाना-लिखाना और संस्कार देना हमारी ज़िम्मेदारी है, लेकिन एक उम्र के बाद उनकी ज़िंदगी पर हमारा अधिकार नहीं रह जाता। हम उन्हें समझा सकते हैं, अनुभव बाँट सकते हैं, सही-गलत बता सकते हैं, लेकिन उनके लिए ज़िंदगी नहीं जी सकते। अगर कोई बेटा या बेटी शादी के लिए तैयार नहीं है, तो शायद हमें उसकी “ना” सुननी सीखनी होगी। अगर उसे किसी और के साथ जीवन बिताना है, तो हमें उसके निर्णय को समझने की कोशिश करनी होगी। ज़बरदस्ती से बने रिश्ते अक्सर बाहर से सुं...