रिश्तों की अहमियत समझिए!...
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अभिनेता नाना पाटेकर और उनकी पत्नी नीलकांति पाटेकर करीब 35 साल से अलग रह रहे थे। खबरों में यह भी बताया गया कि नाना पाटेकर के अंतिम संस्कार के समय उनकी पत्नी नीलकांति अंतिम दर्शन के लिए पहुँचीं।
जरा सोचिए, जिस इंसान के साथ जीवन बिताने का वादा किया था, उसी से दशकों की दूरी और फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब मुलाकात का अवसर केवल अंतिम विदाई तक सीमित रह गया।
काश! जीते-जी एक बार बैठकर बात कर ली होती, गिले-शिकवे दूर कर लिए होते और एक-दूसरे को समझने की कोशिश की होती, तो शायद जीवन की कहानी कुछ और होती।
गलती चाहे किसी की भी रही हो, लेकिन 35 साल तक दूर रहना और फिर अंतिम संस्कार में अंतिम दर्शन के लिए पहुँचना हमें रिश्तों की अहमियत पर सोचने को मजबूर करता है। मन में क्या बीती, इसका दर्द वही समझ सकता है जिसने ऐसी दूरी झेली हो।
एक बात हमेशा याद रखिए: रिश्तों में अहंकार से बड़ा कोई दुश्मन नहीं और समय से कीमती कोई चीज नहीं। जब अपने जीवित हों, तभी उनसे मिल लीजिए, बात कर लीजिए और माफ करना सीख लीजिए।
क्योंकि...
अंतिम संस्कार में अंतिम दर्शन तो हो सकते हैं, लेकिन न हाथ थामने का मौका मिलता है, न दिल की बात कहने का और न ही बीते हुए समय को वापस लाने का।
जीते-जी अपनों की कद्र कीजिए। कहीं ऐसा न हो कि जिंदगी भर का साथ दूरियों में गुजर जाए और अंत में हाथ में सिर्फ यादें, आँसू और मलाल रह जाए।
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