शरद पूर्णिमा पर विशेष आलेख
शरद पूर्णिमा पर विशेष आलेख
शरद की हंसी: जगमग जगमग मधुर चांदनी
सम्मोहित करती, जादू सा जगाती कितनी खूबसूरत होती है चांदनी रात,,,,, उसमें भी शरद पूर्णिमा की ।जब चंद्रमा,,, अपनी 16 कलाओं से पूर्ण और उसकी किरणों में अमृत ।
धरती से लेकर नील गगन तक को अपने आगोश में लपेटी हुई शांत स्निग्ध ज्योत्सना का क्या कहना,,,,! सारे परिवेश में अद्भुत अलौकिक सौंदर्य बिखेरती कोमल कांत भावों को जगाती ,सुमधुर कल्पनाओं का जाल बुनती, फेंटेसी रचती चांदनी प्रकृति की अनुपम भेंट है वैसे ही जैसे-- संगीत-महानतम सौगात।
"नीले नभ के शतदल पर
वह बैठी शारद-हासिनि
मृदु करतल पर शशि-मुख धर
नीरव और अनिमिष एकाकिनी।"
-----'चांदनी':सुमित्रानंदन पंत
प्रकृति कवि पंत जी की' नौका विहार 'कविता हो या 'वह विजन चांदनी की घाटी' हो या 'शरद चांदनी' अथवा जयशंकर प्रसाद के 'कामायनी' महाकाव्य का 'आनंद 'सर्ग हो या निराला और महादेवी की कविताएं ,,,,,,,सब में चांदनी नाना रूपों में मोहक प्रभाव डालती है । पर इन सबके बावजूद यह कहना पड़ता है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी की ये पंक्तियां बार-बार ज़ेहन में उभरती ही है----
"चारु चंद्र की चंचल किरणें
खेल रही है जल थल में
स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है
अवनी और अंबर तल में"
भारत में शरद पूर्णिमा मनाया जाने के साक्ष पौराणिक काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक मिलते हैं ।हजारों वर्षों की निरंतर इसमें है
। यह एक प्रकार से भारत की प्राचीन रितु आधारित चंद्र पूजा और भक्ति परंपरा का हिस्सा है ,जो पौराणिक एवं ऐतिहासिक दोनों में दर्ज है। बौद्ध साहित्य में भी।यह आज भी पूरे भारत में अलग-अलग नाम और रीति रिवाज के साथ मनाया जाती है।
कौमुदी पूर्णिमा/ उत्सव, शारदीय पूर्णिमा, कोजागिरी या कोजागर पूर्णिमा, कुमार पुर्णिमा, नवान्न पूर्णिमा आदि इस सुहानी शरद पूनम के विभिन्न नाम प्रचलित हैं।
भगवान श्री कृष्ण ने महारास लीला इसी शरद पूर्णिमा की रात वृंदावन में यमुना तट पर गोपियों के साथ रचाई थी। भागवत पुराण समेत अनेक पुराणों यथा ब्रह्म पुराण ,स्कंद पुराण ,ब्रह्म विवर्त पुराण ,लिंग पुराण आदि में इस रात का यानी रास पूर्णिमा का वर्णन है।
महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथो में कौमुदी महोत्सव का उल्लेख मिलता है। तीसरी चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में बौद्ध ग्रंथ दीर्घ निकाय में भी इस अवसर पर मगध वाराणसी और श्रावस्ती जैसे स्थानों पर उत्सव मनाने का उल्लेख मिलता है ।यह आज से लगभग ढाई हजार वर्ष की बात है।
'वात्सायन' के 'कामसूत्र' में कौमुदी जागर (चांदनी रात का जागरण )का जिक्र है ।आयुर्वेदिक परंपरा में भी शरद चांदनी के स्वास्थ्यवर्धक माने जाने का जिक्र है। श्वास रोग आदि से संबंधित विशेष दवाइयां देने के लिए इसी शरद पूर्णिमा की रात का इंतजार किया जाता है।
आश्विन मास की पूर्णिमा ही है शरद पूर्णिमा। देश के अलग-अलग देश में थोड़े बहुत परिवर्तन के बावजूद बहुत सारी परंपराएं प्राय सब दूर पाई जाती है, जैसे ----
खीर रखने की परंपरा --
दूध, चावल और चीनी से बनी खीर को चंद्रोदय के बाद खुले आसमान के नीचे छत या आंगन में रखा जाता है ।यह मानकर कि चंद्र किरणों के रूप में अमृत बरसता है। यह खीर स्वास्थ्य और दीर्घायु का प्रतीक मानी जाती है ।
सुई में धागा पिरोना ----
राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के कई इलाकों में शरद पूर्णिमा की रात, चांद की ओर देखते हुए सुई में धागा पिरोने का दृश्य आम था ।इससे आंखों की ज्योति तेज होती है यह मान्यता थी। उज्जैन में रहते हुए मुख्य क्षेत्र फ्रीगंज में इस दृश्य का सहभागी रहा हूं। चांदनी का चांदनी की अनुभूति और आनंद के लिए सरकारी तौर पर रात 10:00 बजे बाद कुछ क्षेत्रों में बिजली बंद कर दी जाती थी। ऐसे में उठी क्षेत्र के सुनसान इलाकों में मंद मंद मुस्कुराती श्वेत धवल चांदनी के साथ आंख में चोली अद्भुत अनुभव था। शहरों में बिजली की चकाचौंध ने ये दृश्य और अवसर दुर्लभ कर दिए हैं। टीवी ,मोबाइल और नई डिजिटल दुनिया में व्यस्त जिंदगी ने इस प्रकृति उत्सव को औपचारिकता में बदल दिया है।
चंद्र पूजा
यह परंपरा भी सभी दूर है ।चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्ध्य दिया जाता है। मध्य प्रदेश ,राजस्थान आदि जगह तो अनेक स्त्रियां प्रत्येक माह की चौथ तिथि को व्रत रखती है । रात को चंद्र दर्शन करके, उसे अर्ध्य देकर ही भोजन ग्रहण करती हैं।
लक्ष्मी पूजा और जागरण
अनेक प्रदेशों/क्षेत्रों में किया जाता है ।इसीलिए इसे 'कोजागिरी पूर्णिमा 'भी कहते हैं। जिसका अर्थ ही है जागरण।पश्चिम बंगाल ,असम, उड़ीसा, महाराष्ट्र मिथिला बिहार आदि जगह कोजागिरी के रूप में मनाया जाता है।
व्रत
उत्तर भारत में विशेष कर ग्रामीण अंचलों में प्रत्येक पूर्णिमा को व्रत रखना ,कई जगह लक्ष्मी नारायण/सत्यनारायण की कथा करवाने की परंपरा आज तक प्रचलित है।
शरद पूर्णिमा,,,, त्योहारों और उत्सवों के देश भारत में ही नहीं,
दुनिया के अन्य देशों में भी, विशेष कर पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया में अलग-अलग नाम रूपों में मनाई जाती है।
चीन में 'मध्य शरद उत्सव 'मीड आइटम फेस्टिवल', कोरिया में 'चुसोक 'के नाम से, वियतनाम में 'टेट टुंग थू 'के नाम से, जापान में 'त्सुकिमी' और नेपाल में 'कोजागृत पूर्णिमा 'के रूप में यह उत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव फसल , चंद्रमा और परिवार की खुशियों को समर्पित है। शरद पूर्णिमा मूलतः फसल का त्यौहार भी है, क्योंकि बरसात के बाद शरद ऋतु प्रारंभ होती है।
शरद पूनम की चांदनी रात में इसके स्वप्निल सौंदर्य को आंखें भर भर निहारें, चाहे अंजलि भर -भर इसका अमृत पान करें, चाहे आसमान के नील सरोवर में तैरते चांद के साथ ,सपनों की,कोमल भाव लहरियों की दुनिया में खो जाएं,,, सम्मोहक है अद्भुत है- शरद की कथा। जगमगाते रोशनियों की चकाचौंध में इस प्रकृति महोत्सव का मजा आनंद कम पड़ने लगा है
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