❗माता के दो रूप होते हैं❗*
*आश्विन शुक्लपक्ष अष्टमी २०८३*
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*‼️ऋषि चिंतन ‼️*
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*❗माता के दो रूप होते हैं❗*
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👉 *"माता" का अपने बच्चे पर असाधारण प्यार होता है, वह उसे सुखी बनाने के लिए अपनी समझ के अनुसार कोई बात उठा नहीं रखती तो भी उसके कई कार्य ऐसे हैं जो बालक को अप्रिय होते हैं।* बालक किसी स्वादिष्ट भोजन को बहुत अधिक मात्रा में खाना चाहता है, माता जानती कि अधिक खाने से यह बीमार पड़ जायेगा इसलिए वह बच्चे के रूठने, रोने, हाथ पाँव पीटने की कुछ भी परवाह न करके उतना ही खाने देती है जितना कि आवश्यक है। *आग हथियार बारूद आदि से बच्चे को दूर रखा जाता है, वह उनसे खेलना चाहे तो बलपूर्वक रोक दिया जाता है। घर के पशुओं के साथ खेलना चाहे तो भी उसे रोका जाता है ताकि उनके पैरों की चपेट में आकर कहीं कुचल न जाय ।* बच्चा खिड़की छज्जों में से बाहर की और झुक कर देखना चाहे तो उसकी स्वाधीनता को तुरन्त रोक दिया जाता है। *कोई अनुचित काम करने पर चपत भी लगाई जाती हैं और डराने के लिए कोठरी में भी बन्द कर दिया जाता है। कई बार उसे मुर्गा बनाने, धूप में खड़ा होने, कान पकड़ कर उठने बैठने, भूखा रहने, आदि की सजा दी जाती है।* बीमार होने पर माता उसे कडुई दवा जबरदस्ती पिलाती है और उसके कष्ट की परवाह न करके आवश्यक होने पर इन्जेक्शन या आपरेशन कराने के लिए भी छाती कड़ी करके तैयार हो जाती है ।
👉 *बालक समझता है कि माता बड़ी निष्ठुर है, मुझे अमुक वस्तु नहीं देती, अमुक प्रकार सताती है और अमुक कष्ट पड़ने पर भी मेरी सहायता नहीं करती । अल्पज्ञान के कारण वह माता के प्रति अपने मन में दुर्भावना ला सकता है, उस पर निष्ठुरता का दोषारोपण कर सकता है, पर निश्चय ही उसकी मान्यता भ्रमपूर्ण होती है, यदि वह माता के हृदय को देख सकता तो उसे प्रतीत होता कि उसमें कितनी अपार करुणा भरी हुई है और कितना ऊँचा वात्सल्य उसमें हिलोरें ले रहा है, यदि इतना वात्सल्य उसमें न होता तो उसके हित साधन के लिए बच्चे के कष्ट के समय होने वाले अपने दुःख को, वह किस प्रकार छाती कड़ी करके सहन करती ?*
👉 *माता के दुलार के तरीके दो प्रकार के होते हैं। एक-वे जिनसे बालक प्रसन्न होता है। जब उसे मिठाई, खिलौने बढ़िया कपड़े आदि दिये जाते हैं और सैर कराने या तमाशे दिखाने ले जाया जाता है तो बालक प्रसन्न होता है और सोचता है कि मेरी माता कितनी अच्छी है। परन्तु जब माता काजल लगाने के लिए हाथ पकड़ कर जबरदस्ती करती है, जबरदस्ती नहलाती है, स्कूल जाने के लिए कमची फटकार कर विवश करती है तो बच्चा झल्लाता है और माता को कोसता है।* बाल बुद्धि नहीं जानती कि कभी मधुर कभी कठोर व्यवहार उनके साथ क्यों किया जाता है। वह माता के वात्सल्य पर शंका करता है, जो 'वस्तु स्थिति' को जानते हैं उन्हें पता है कि माता बच्चे के प्रति केवल उपकार का व्यवहार ही कर सकती है। *मधुर और कठोर दोनों ही व्यवहारों में वात्सल्य भरा होता है। प्रभु की कृपा भी दो प्रकार की होती है-एक सुख दूसरी दुःख । दोनों में ही हमारा हित और उसका स्नेह भरा होता है।* अल्पज्ञता उस वस्तुस्थिति से हमें परिचित नहीं होने देती, पर भगवान की जब कृपा होती है, सद्बुद्धि का हृदय में प्रकाश हो जाता है, तो 'कष्ट' नाम की दुःख देने वाली कोई वस्तु शेष नहीं रहती। *कठोर एवं प्रतिकूल परिस्थितियाँ एक भिन्न प्रकार का दैवी उपहार प्रतीत होती हैं और उनसे डरने या दुःखी होने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता ।*
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*आपत्तियों में धैर्य Code GP-05 पृष्ठ ०८*
*🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁*
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