डुबकी नदी में या विकास में?
डुबकी नदी में या विकास में?
एक व्यंग्यात्मक लघुकथा
हजार किलोमीटर दूर से एक श्रद्धालु पवित्र नदी में डुबकी लगाने नगर पहुँचा। मन में आस्था थी, आँखों में मोक्ष का सपना।
स्टेशन से घाट तक आते हुए वह चमचमाती सड़कों, रंग-बिरंगी एलईडी लाइटों और विशाल फ्लाईओवरों को देखकर अभिभूत हो गया। जगह-जगह लगे होर्डिंग चिल्ला रहे थे— “बदला हुआ पुरातन नगर, अकल्पनीय विकास!”
वह बुदबुदाया, “वाह! अब तो भगवान के साथ विकास के भी दर्शन होंगे!”
लेकिन घाट पर पहुँचते ही उसकी आस्था को सीवर की दुर्गंध ने झकझोर दिया। उसने नदी का जल हथेली में लिया, मगर आचमन करने से पहले ही नाक सिकुड़ गई।
पास खड़े पंडित से पूछा, “महाराज, यह पवित्र नदी है या नालों का संगम? पाप धोने आया था, कहीं बीमारियाँ लेकर न लौट जाऊँ!”
पंडित मुस्कुराए, “वत्स! शहर के चौदह आधुनिक नालों का प्रेम इसी नदी में उमड़ता है। इसे विकास की गंगा समझो! यहाँ शुद्धिकरण का उद्घाटन हो चुका है, बस नदी को शुद्ध होने की अनुमति अभी नहीं मिली।”
श्रद्धालु ने नदी की ओर देखा, फिर आसमान छूते फ्लाईओवर की ओर। कुछ देर चुप रहा, फिर बोला—
“महाराज, मैं जन्म-जन्मांतर के पाप धोने आया था, लेकिन यहाँ तो लगता है कि सरकार ने पापों के साथ नालों को भी मोक्ष दिलाने की व्यवस्था कर दी है! सड़कें इतनी चमक रही हैं कि नदी की गंदगी भी विकास की रोशनी में दिखाई नहीं देती।”
पंडित ने होर्डिंग की ओर इशारा करते हुए कहा, “वत्स, नदी की हालत पर सवाल मत करो। देखो, ऊपर विकास का बोर्ड लगा है—सरकारी दृष्टि में बोर्ड चमक जाए तो नदी अपने-आप निर्मल मानी जाती है।”
श्रद्धालु ने पूछा, “तो क्या इस पानी में स्नान करने से मोक्ष मिलेगा?”
पंडित बोले, “मोक्ष का तो पता नहीं, पर अस्पताल तक जाने के लिए नई सड़क जरूर मिल जाएगी। यही तो अकल्पनीय विकास है!”
उसने स्नान का विचार त्यागा, हाथ जोड़े और स्टेशन की ओर लौट पड़े।
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