अगेठा है!
कुछ अगेठे दीवार खोदकर बनाये जाते हैं। पहले के समय में मिट्टी से दीवार बनाई जाती थी जो काफी मोटी होóती थी उन दीवारों को खोदकर अगेठा बना दिया जाता था।
कुछ लोग चिकनी मिट्टी से बनाया करते थे।
अंगेठा के नीचे की सतह में राख और आग रहती थी और उपर बरतन रखा जाता था। अंगेठा के उपरी भाग में छोटे छोटे छेद किए जाते थे ताकि धुआं निकल सके और अंगेठा में रखे दूध या भोजन में धुएँ की सुगंध न बस सके।
इस अंगेठा को ढंकने के लिए मिट्टी का ही ढक्कन बनाया जाता था जिसे पिहाना कहा जाता था।
इस अंगेठा में सुबह ही उपले रखकर आग बना दी जाती थी ताकि अच्छी तरह से आग बन सके और धुआं निकल जाए उसके बाद गाय भैंसों से दूध निकाल कर छानकर दूध रखने के मिट्टी के बरतन में जिसे दूधहांडी कहते थे रखकर दूध गर्म होने के लिए रख दिया जाता था।
ये दूध पूरा दिन इस अगेठे में गर्म होता रहता था। अगेठे में आग कम होने लगती थी तो फिर से कुछ उपले के टुकड़े डाल दिए जाते थे।
धीमी धीमी आँच में सारा दिन गर्म हुआ दूध एकदम लाल हो जाता था और उसमे से एक अद्भुत सी सुगंध आने लगती थी। इस दूध के उपर एक मोटी मलाई की परत जम जाती थी जिसे खाने का आनंद वहीं बता सकता है जिसने खाया हो।
शाम को जब दूध अच्छी तरह गर्म होकर मलाईदार हो जाता था और उसकी गरमाहट उपयुक्त हो जाती है अर्थात गुनगुनी सी हो जाती है तब उसे पहले से ही धोकर धूप में सूखाकर सोंधी की गयी मिट्टी की मटकी में डालकर उपर से थोड़ी सी दही जिसे जामन कहते हैं डालकर दही जमा दी जाती थी।
ये दही भी इसे अंगीठी में जमाई जाती थी क्योंकि ये पर्याप्त मात्रा में गर्म रहता था और दही को जमने के लिए उपयुक्त तापमान मिल जाता था। दही जमाने के बाद दूधहांडी में लगा सूखा दूध, मलाई को एक सीपी (जिसे सुतूही भी कहते हैं)से खुरच या करोय लिया जाता था ये हम सब बच्चों की सबसे स्वादिष्ट खाने की चीज़ होती थी जिसका आनंद एवं स्वाद अद्भुत होता था इसे खुरचुनी या करोवनी कहते थे।
दिन भर गर्म होकर लाल हुए दूध की दही भी एकदम लाल और इतनी गाढ़ी होती थी कि आप यदि कलछी से निकालकर थाली में रखते तो वो दही कलछी का आकार लेकर थाली में वैसे ही जमी रहती इधर उधर जरा भी नहीं फैलती थी और उस दही का स्वाद तो अहा!
मत पूछिये!
आपने सुना होगा कि पहले के समय में दही इस तरह बनती थी कि गमछे में बांधकर कहीं भी लिये जाओ तो ये बात एकदम सत्य थी वो दही इसी तरह की ही होती थी।
अब तो न वो दही रही न वो दूध न जमाने वाले रह गए बस यादे रह गयी हैं और अब सोयाबीन पाउडर और शहरों मैं थैली बाले दूध व अमूल की डिब्बे वालीं दही रह गयी है..आपका रवि शर्मा,✨
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