WhatsApp forward
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं वेदों में सामवेद हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म "गायन विधा" का धर्म है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं धन का स्वामी कुबेर हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म "ऐश्वर्य और समृद्धि" का धर्म है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "कवियों में शुक्राचार्य कवि मैं ही हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म "काव्य" का धर्म है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक, मेधा, धृति और क्षमा हूं" तो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म "नारी" को सर्वोपरि मानने का धर्म है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं ऋतुओं में वसंत हूं" तो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म आनंद और उल्लास का धर्म है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं जीतने वालों का विजय हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म केवल "विजय श्री" का वरण करने वालों का धर्म है पराजित होकर आंसू बहाने वालों का नहीं।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म कुत्सित भाव वालों का धर्म नहीं है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विश्व को अपने तेज से आलोकित करने वालों का धर्म है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विश्व को अपनी शीतलता देने वाला धर्म है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं देवों में इंद्र हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विश्व में इंद्र के समान शोभित होने के लिए प्रकट है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं शिखर वाले पर्वतों में सुमेरू और स्थिर रहनेवालों में हिमालय पर्वत हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विशालता, स्थिरता और गंभीरता का धर्म है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विश्व को और मानवता को प्राणवायु देने वाला धर्म है।
श्रीकृष्ण गीता में जब कहते हैं कि "मैं घोड़े में उच्चै:श्रवा नाम का घोड़ा, हाथियों में ऐरावत, पशुओं में मृगराज सिंह, पक्षियों में गरुड़, गौओं में कामधेनु, मछलियों में मगर और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूं तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विश्व के समस्त जीव -जंतुओं के संरक्षण और संवर्धन का धर्म है।
श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं नदियों में भागीरथी गंगा जी हूं" तो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म प्रकृति के साथ सहचारिता का धर्म है।
कालिंदी के तट पर श्रीकृष्ण के श्री मुख से निकली गीता ज्ञान सर्वकालिक और काल निरपेक्ष है जिसकी प्रासंगिकता हर युग में है, हर समय में है।
विश्व में 'कृष्ण' अकेले हैं जो ये दावा करते हैं कि वो स्वयं ईश्वर हैं बाकी किसी ने भी ऐसा दावा करने की हिम्मत नहीं की।
इसी तरह गीता जी भी अकेला ग्रंथ है जो सीधे श्रीभगवान के श्री मुख से निःसृत है और किसी दूसरे या तीसरे के माध्यम से नहीं आया।
अटल जी की कविता है :-
अपढ़, अजान विश्व ने पाई,
शीश झुकाकर एक धरोहर
कौन दार्शनिक दे पाया है,
अब तक ऐसा जीवन-दर्शन?
कालिन्दी के कल कछार पर,
कृष्ण-कंठ से गूंजा जो स्वर
अमर राग है, अमर राग है.........
इस आग को हम हिंदू अपने हृदय में धारण करें। 🌺 जगत्नीयंता भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की मंगलकामनाएं ।
🙏🙏🙏
Comments
Post a Comment