"देवता" बनें, मुक्त हस्त से दीजिए*
*"देवता" बनें, मुक्त हस्त से दीजिए*
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👉 *"निःस्वार्थ भावना" से जीवन व्यतीत करने वाले के लिये संसार में निरुत्साह, पश्चात्ताप और दु:ख की कोई बात नहीं है।* आप जरा सी बात के आवेश में आकर लड़ने मरने पर उतारू मत हूजिये। *सद्भावना से "दिव्य दृष्टि" मिलती है।* जिसके हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति सद्भावना भरी हुई है यथार्थ में वही दिव्य ज्ञान का अधिकारी है। *मनुष्यों में "देवता" वह है जो पवित्र है, निस्वार्थ है, प्रेमी है, त्यागी भाव है।* अपने तुच्छ शारीरिक स्वार्थों को परित्याग करने के उपरान्त जो सन्तोष प्राप्त होता है वह चक्रवर्ती राजा हो जाने के सुख से भी हजारों गुना अधिक है। *इसलिये आप "स्वार्थ" को त्यागने का अभ्यास आरम्भ कीजिये।* ज्ञान के द्वारा अपनी पाशविक कंजूस वृत्ति को काबू में लाने का प्रयत्न करिये। तुच्छ स्वार्थों के गुलाम बनने से इनकार कर दीजिये। *नम्रता, भलमनसाहत, क्षमा, दया, प्रेम और त्याग भावना को अन्दर धारण करने से हृदय में शाश्वत शान्ति का आविर्भाव होता है।* स्वार्थ रहित प्रेम के इस महान नियम में अपने को केन्द्रस्थ करना मानो सन्तोष, शीतलता, विश्राम और ईश्वर को प्राप्त करने के मार्ग पर पदार्पण करना है।
👉 *जानना चाहिये, कि "प्रेम" का अर्थ है "त्याग" और "सेवा।"* *आप घर के हर एक व्यक्ति के पक्ष में अपने स्वार्थों को छोड़िए और जिसे जिस वस्तु की आवश्यकता है, उसे प्रदान कीजिये।* वृद्ध जन आप से शारीरिक सेवा चाहते हैं, बालक आप के साथ हँसना-खेलना चाहते हैं, भाइयों को आपका आर्थिक सहयोग चाहिए, स्त्री को आपके स्नेह पूर्ण वार्तालाप की आवश्यकता है। *जो जिस वस्तु को चाहता है, उसे वह प्रदान कीजिये, परन्तु ध्यान रखिये "प्रेम" कोई "व्यापार" नहीं है।* एक हाथ से देकर दूसरे हाथ से माँगने की नीति प्रेमी को शोभा नहीं दे सकती। *"वृद्धजनों" से आप आशा मत करिये कि वे "आपकी प्रशंसा" करें ही। न "भाइयों" से यह चाहिये कि कमाऊ होने के नाते आपको कुछ "अधिक महत्व" दें। "स्त्री" यदि आपकी इच्छानुकूल सुश्रूषा करने में असमर्थ है, तो उस पर झुंझलाइये मत क्योंकि आप "प्रेमी" बनने जा रहे हैं। "प्रेमी" देकर माँग नहीं सकता।*
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*जीवन की श्रेष्ठता और उसका सदुपयोग Code VN-45 पृष्ठ ४४*
*🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁*
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