जय सनातन धर्म 🙏

आपके द्वारा किसी का अहित नहीं होना चाहिये। दूसरे के अहित की बात सोचना पारमार्थिक मार्ग में बड़ी भारी बाधा है। यह दूसरे का नुकसान नहीं है, प्रत्युत अपना नुकसान है। दूसरे का नुकसान तो उतना ही होगा, जितना उसके प्रारब्ध में है, पर अपना नुकसान नया होगा। दूसरे के नुकसान में उसके पाप नष्ट होंगे, जिससे उसका हित होगा; परन्तु हमारा नया कर्म ( पाप ) बनेगा, जिससे हमारा अहित होगा। इसलिये वास्तव में अहित उसी का होता है, जो दूसरे का अहित करता है।

अगर आप अपना जीवन शुद्ध, निर्मल बनाना चाहते हैं तो किसी का भी बुरा न करें। बुराई न करना भलाई का बीज है। बुराई छोड़ने मात्र से आप भले हो जाओगे। एक गहरी बात है कि ‘करने’ में तो परिश्रम होता है, पर ‘न करने’ में परिश्रम नहीं होता। भला करने में तो परिश्रम है, पर किसी का बुरा न करने में कोई परिश्रम नहीं है। करने की अपेक्षा न करना सुगम होता है। न करने में न तो परिश्रम होता है, न पैसे खर्च होते हैं। किसी का बुरा करना, किसी का बुरा चाहना और किसी को बुरा समझना‒ये तीन बातें आप बिल्कुल न करें। केवल यह सावधानी रखनी है कि हमारे से किसी का अहित न हो जाय। किसी का भी बिगाड़ होता है, वह अपना ही होता है। किसी का बुरा नहीं करेंगे, किसी का बुरा नहीं चाहेंगे और किसी को बुरा नहीं समझेंगे‒इन तीन बातों का आप नियम ले लो तो आपका ‘कर्मयोग’ सिद्ध हो जायगा । आपका सत्संग करना सफल हो जायगा। आप सत्संग करते हो । सत्संग करने वाले से सब लोग अच्छाई की आशा रखते हैं।

*जय श्री भगवत गीता जय सनातन धर्म 🙏

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