राजस्थानी गणेश जी🙏
राजस्थान की राजधानी जयपुर में अरावली की नाहरगढ़ पहाड़ी पर स्थित गढ़ गणेश मंदिर अपनी अनूठी परंपरा और इतिहास के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है।
इस मंदिर की स्थापना और बिना सूंड वाले गणेश जी का इतिहास जयपुर शहर की स्थापना से सीधे जुड़ा हुआ है:
18वीं शताब्दी (वर्ष 1730 के आसपास) में जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 'अश्वमेध यज्ञ' का आयोजन कराया था। यज्ञ के पूरा होने के बाद, जयपुर (जैनगर) की स्थापना से पूर्व उन्होंने इस मंदिर की नींव रखी।
शास्त्रों और मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश का जन्म माता पार्वती के उबटन से हुआ था और शुरुआत में वह एक सामान्य मानव शिशु (बाल स्वरूप) के रूप में थे, जिनकी सूंड नहीं थी। महाराजा सवाई जयसिंह ने मंदिर में गणेश जी के इसी 'बाल गणेश' (विनायक) रूप को प्रतिष्ठित करवाया। बालक रूप होने के कारण इस प्रतिमा में सूंड नहीं है।
मंदिर को अरावली की सबसे ऊंची पहाड़ियों में से एक पर इस प्रकार बनाया गया कि बालक गणेश पूरे जयपुर शहर पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें। सिटी पैलेस (राजमहल) की ऊपरी मंजिलों और चंद्र महल से दूरबीन या नंगी आंखों से सीधे इस मंदिर के दर्शन किए जा सकते थे। जयपुर के राजा अपने दिन की शुरुआत गढ़ गणेश जी के दर्शन करके ही करते थे।
मंदिर की अन्य विशेषताएं
पुरुषोत्तम (पुरुष रूप) मूषक: मंदिर में गणेश जी के वाहन चूहे (मूषक) की भी दो विशाल प्रतिमाएं हैं, जिनके कान में श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं।
बिना दूरबीन के दर्शन: पहाड़ी पर स्थित होने के कारण मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, जो वर्ष के 365 दिनों का प्रतीक मानी जाती हैं।
धार्मिक उत्सव: गणेश चतुर्थी और भाद्रपद महीने में यहाँ भव्य मेले का आयोजन होता है, जहाँ देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
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