"उपवास"🙏
*श्रावण शुक्लपक्षएकादशी २०८३*
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*‼️ऋषि चिंतन ‼️*
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*❗➖धार्मिक उपवास➖❗*
*➖और➖*
*➖ ‼️आत्मा की पवित्रता ‼️➖*
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👉 *"उपवास" द्वारा मनुष्य की "नैतिक" और "आध्यात्मिक" उन्नति होती है, उसकी बुद्धि और विवेक जाग्रत होता है, यह देखकर ही हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने धर्म के अंतर्गत उपवास को विशेष स्थान प्रदान किया है।* इससे मनुष्य के मानसिक और 1¹आ प्रकार के उपवासों का ही विधान नहीं, प्रत्युत बहुकाल व्यापी उपवासों का विधान है।* जैनियों के उपवास सप्ताहों और महीनों तक चलते हैं। *मिश्र में प्राचीन काल में कई धार्मिक पर्वों पर "उपवास" किया जाता था, किंतु वह जन-साधारण के लिए अनिवार्य नहीं था। "यहूदी" अपने सातवें महीने के दसवें दिन "उपवास" रखते हैं।* उनके धर्म में जो इस उपवास का उल्लंघन करता है, वह दंडनीय है। इसके अंतर्गत प्रातः से सायंकाल तक निराहार रहना पड़ता है। ईसाई धर्म में तथा ईसा की पाँचवीं शताब्दी से पूर्व महात्मा सुकरात ने उन दिनों यूनान में प्रचलित कितने ही उपवासों का जिक्र किया है। रोमन जाति के व्यक्ति ईस्टर से पूर्व तीन सप्ताहों में शनिवार और रविवार के अतिरिक्त अन्य दिनों में उपवास किया करते थे। महात्मा ईसा ने स्वयं एक बार चालीस दिन और चालीस रात्रियों का उपवास किया था। *योरोप में जब पोप (ईसाई धर्माचार्यों) का प्रभाव बढ़ा तो उपवासों को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया। मुसलमान रमजान के महीने में अपने धर्मग्रंथों के अनुसार तीस दिन तक रोजे रखते हैं।* प्रात: काल ब्राह्ममुहूर्त में कुछ खाकर सूर्यास्त के पश्चात रोजा टूटता है। *तात्पर्य यह है कि सभी प्रधान धर्मों में "उपवास को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है।* सभी ने एक स्वर से उसकी उपयोगिता स्वीकार की है। *"उपवास" से शरीर, मन तथा आत्मा पर लाभदायक प्रभाव को देखकर ही उसे धर्म के अंतर्गत स्थान दिया गया है।*
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*"पवित्र जीवन"- Code GP-12 पृष्ठ १३*
*🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁*
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