विनम्बर श्रद्धांजलि🙏

1940 में मेहबूब ख़ान अपनी फ़िल्म "औरत" बना रहे थे, जिसमें एक अधेड़ उम्र के बेरहम साहूकार सुखीलाला का किरदार निभाना था। शूटिंग के दिन एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई — कोई भी मेकअप आर्टिस्ट इस किरदार के लिए उपलब्ध या तैयार नहीं था। अभिनेता ख़ुद परेशान हो गया, मगर छायाकार फ़रेदून ईरानी ने बड़ी सहजता से कहा — "फ़िक्र मत करो, बस जैसे हो वैसे ही आ जाओ, मैं तुम्हें बिना मेकअप के ही फ़िल्मा लूंगा।" अभिनेता ने बस एक मूंछ लगाई, और बाक़ी कुछ नहीं — कोई मेकअप नहीं, कोई बनावट नहीं। यह परफ़ॉर्मेंस इतनी असरदार और सच्ची रही कि फ़िल्म गोल्डन जुबली हिट बन गई। सत्रह साल बाद, जब मेहबूब ख़ान ने इसी फ़िल्म को "मदर इंडिया" (1957) के नाम से दोबारा बनाया, तो उन्होंने इसी अभिनेता को दोबारा सुखीलाला के किरदार में लिया — हिंदी सिनेमा के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि किसी अभिनेता ने इतने लंबे अंतराल के बाद वही किरदार दोबारा निभाया। यह अभिनेता थे कन्हैयालाल, जिनकी सादगी भरी, बिना बनावट वाली अदाकारी ने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार खलनायकों में शुमार कर दिया।
आज कन्हैयालाल की 44वीं पुण्यतिथि है।
कन्हैयालाल चतुर्वेदी का जन्म 15 दिसंबर 1910 को बनारस, उत्तर प्रदेश में हुआ। पिता पंडित भैरोदत्त चौबे, जिन्हें "चौबेजी" कहा जाता था, बनारस में "सनातन धर्म नाटक समाज" नामक एक थिएटर कंपनी के मालिक थे। पिता की इच्छा के ख़िलाफ़, कन्हैयालाल ने बचपन से ही फ़िल्मों और नाटकों की दुनिया में क़दम रखने की ज़िद पकड़ी, और आख़िरकार पिता को मना लिया। सिर्फ़ चौथी कक्षा तक हिंदी माध्यम स्कूल में पढ़ाई करने के बाद, सोलह साल की उम्र से ही उन्होंने नाटकों के लिए लिखना शुरू किया, और छोटी-मोटी भूमिकाएं भी निभाने लगे।
उनके बड़े भाई संकटा प्रसाद चतुर्वेदी पहले से ही मूक फ़िल्मों के दौर में एक स्थापित अभिनेता बन चुके थे, मगर दिलचस्प बात यह है कि कन्हैयालाल का इरादा शुरू में अभिनय करने का बिल्कुल नहीं था — वे बतौर लेखक और निर्देशक अपनी पहचान बनाना चाहते थे। पिता के निधन के बाद, उन्होंने और उनके बड़े भाई ने पिता की नाटक कंपनी संभालने की कोशिश की, मगर यह कामयाब नहीं रही, और उन्हें कंपनी बंद करनी पड़ी। गुज़ारे के लिए दोनों भाइयों ने कुछ वक़्त तक एक किराने की दुकान भी चलाई।
आख़िरकार कन्हैयालाल मुंबई आ गए, अपने सपनों को पूरा करने के इरादे से — मगर अभिनय के लिए नहीं, बल्कि स्टेज पर लेखक और निर्देशक बनने के लिए। उन्होंने अपना लिखा नाटक "पंद्रह अगस्त" मुंबई में मंचित किया, मगर यह ज़्यादा कामयाब नहीं रहा। निराश होकर उन्होंने फ़िल्मों में बैकग्राउंड एक्स्ट्रा का काम शुरू कर दिया, सागर मूवीटोन की "सागर का शेर" से। 1939 की "एक ही रास्ता" में उन्हें "बांके" के नाम से एक मामूली रोल मिला। शायद वे हमेशा एक एक्स्ट्रा ही बने रहते, अगर क़िस्मत ने एक अप्रत्याशित मोड़ न लिया होता — और वह मोड़ था "औरत" में सुखीलाला का वह किरदार।
"औरत" की कामयाबी के बाद, कन्हैयालाल ने अपनी अदाकारी की विविधता का भी भरपूर प्रदर्शन किया। "बहन" (1941) में उन्होंने एक नेकदिल जेबकतरे का किरदार निभाया — इतना सराहा गया कि लेखक वजाहत मिर्ज़ा ने उनके लिए शुरू में सोचे गए चार सीन्स को बढ़ाकर चौदह कर दिया। "राधिका" (1941) में एक मंदिर के पुजारी का किरदार, और "लाल हवेली" (1944) में एक हास्य पंडित का किरदार — इन सभी भूमिकाओं में उनकी सहज, स्वाभाविक अदाकारी झलकती थी।
मगर "मदर इंडिया" (1957) ने उनकी छवि हमेशा के लिए एक सांचे में ढाल दी — ठीक वैसे ही, जैसे 1975 की "शोले" ने अमजद ख़ान को हमेशा के लिए "गब्बर सिंह" बना दिया। इसके बाद कन्हैयालाल को ज़्यादातर लालची साहूकार, चापलूस ज़मींदार का साथी, या शहरी कहानियों में हवसख़ोर व्यापारी जैसे किरदार ही मिलने लगे — जबकि उनकी असली अदाकारी की गहराई और विविधता कहीं ज़्यादा बड़ी थी। "गंगा जमुना" (1961) में उन्होंने एक मुनीम का यादगार किरदार निभाया, और "सौतेला भाई" (1962) में भी उनका काम सराहा गया, हालांकि यह फ़िल्म बॉक्स-ऑफ़िस पर नाकाम रही।
अपने पैंतालीस साल से भी लंबे करियर में कन्हैयालाल ने डेढ़ सौ से भी ज़्यादा फ़िल्मों में काम किया — "उपकार", "दोस्त", "अपना देश", "होली आई रे", "जनता हवलदार", "ऊंचे लोग", "सन ऑफ़ इंडिया", "हथकड़ी" जैसी फ़िल्मों में उनकी मौजूदगी यादगार रही। "मदर इंडिया" को भारत की तरफ़ से पहली बार ऑस्कर के बेस्ट फ़ॉरेन लैंग्वेज फ़िल्म कैटेगरी में आधिकारिक नामांकन मिला — और इस ऐतिहासिक उपलब्धि में कन्हैयालाल की परफ़ॉर्मेंस का भी अहम योगदान माना जाता है।
14 अगस्त 1982 को बहत्तर साल की उम्र में दिल्ली में उनका निधन हो गया।
आज, उनकी पुण्यतिथि पर, कन्हैयालाल को श्रद्धांजलि — उस अभिनेता को, जिसने बिना किसी मेकअप या बनावट के, सिर्फ़ अपनी सच्ची अदाकारी के दम पर, हिंदी सिनेमा के इतिहास के सबसे यादगार किरदारों में से एक को अमर कर दिया।
Kanhaiyalal 🙏🙏🙏
[14/08, 8:12 pm] C s Vijayvargiya: *हम आज़म खान को होम मिनिस्टर बनाएंगे  जब यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकारी आयेगी ----- शिवपाल यादव*

आप सोचो जो आजम खान  जेल में बंद है जिसके ऊपर कई आपराधिक केस चल रहे है जो एक माफिया गुंडा है उसको समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव , शिवपाल यादव होम मिनिस्टर बनाएंगे उत्तर प्रदेश की जनता को अभी से सावधान होना चाहिए इन परिवारवादी परियों का इरादा देखिए आजम खान को गृह मंत्री बनाएगा तो हिंदू को क्या हाल करेगा इसलिए कोई भी यूपी का हिंदू इन गद्दारों को वोट ना दें

अगर गलती से भी यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार आ गई तो यह यूपी का क्या हाल करेंगे आप कल्पना भी नहीं कर सकते

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