आज का भगवद चिंतन ‼️

 आज का भगवद चिंतन ‼️*।। मन की संतुष्टि बनाम आत्मसंतुष्टि ।।*_‼️
**********************
🛐संतुष्टि दो प्रकार की होती है एक मन की संतुष्टि दूसरी आत्मा की, किंतु दोनों में अंतर है। जहां संशयात्मक वृत्ति होने से मन का चिंतन स्वार्थपरक होता है। वहीं निर्विकार और तटस्थ भाव का अधिष्ठाता होने से आत्मा का चिंतन सदा परार्थ के लिए होता है। जब मन स्वार्थ के चक्र में फँसकर भौतिक सुखों की प्राप्ति में लगा रहता है, तब उसकी संतुष्टि अस्थिर और क्षणभंगुर हो जाती है। दूसरी ओर, आत्मा का परार्थ चिंतन दूसरों के कल्याण से जुड़कर स्वयं में गहन शांति का अनुभव कराता है। यह शांति न किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर करती है, न ही समय के साथ क्षीण होती है। अत: स्वार्थपूर्ण चिंतन होने से मन की संतुष्टि कभी वास्तविक सुख प्रदान नहीं करती, जबकि परार्थमय चिंतन होने से आत्मसंतुष्टि सदैव वास्तविक सुख शांति प्रदान करती है। इसलिए मन की संतुष्टि कभी आत्मसंतुष्टि नहीं हो सकती।🛐

*आज का दिन शुभ मंगलमय हो।🙏🍀जय गुरुदेव 🍀🙏
 *यदि हमें ठोकर लगकर भी संभलना नहीं आता तो इसका अर्थ है कि हमें जीवन पथ पर चलना भी नहीं आता। ठोकरों की डर से चलना तो नहीं छोड़ सकते। ठोकरों से सीख लेकर चलने वाला व्यक्ति एक दिन सकुशल अपने गंतव्य तक पहुँच ही जाता है।* 

       *आपका दिन मंगलमय हो*

   🙏🌷 *शुभ प्रभात* 🌷🙏

Comments

Popular posts from this blog

Changing Self Vs Changing Scene?????

See Good in Others

Imagine To Innovate