भगवान और भक्त के अटूट प्रेम और विश्वास🙏
*यह कथा भगवान और भक्त के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। जब महाराज पुरुषोत्तम देव कांची अभियान पर थे, तब स्वयं भगवान जगन्नाथ और बलभद्र गुप्त रूप से उनकी सहायता के लिए जा रहे थे। रास्ते में माणिकी नाम की एक निर्धन ग्वालन से उन्होंने दही पिया*।
*अपनी दैवीय लीला के कारण उनके पास धन नहीं था, इसलिए उन्होंने मूल्यवान रत्नजड़ित मुद्रिका (अंगूठी) माणिकी को दी और कहा कि पीछे आ रहे राजा से इसका मूल्य ले लेना। जब राजा ने वह अंगूठी देखी, तो वे भाव-विभोर हो गए क्योंकि वह साक्षात भगवान की मुद्रिका थी*।
मुख्य संदेश:
*ईश्वर भाव के भूखे हैं: भगवान धन या वैभव नहीं, बल्कि भक्त का शुद्ध प्रेम और निस्वार्थ सेवा देखते हैं*।
*भक्त का ऋण: भगवान अपने भक्त के प्रेम का कर्ज कभी शेष नहीं रखते; वे स्वयं को भक्त का 'ऋणी' मानकर उसे मान और मोक्ष प्रदान करते हैं*।
*अमरता: माणिकी के इसी निस्वार्थ प्रेम के कारण आज भी उस स्थान को 'माणिकापाटना' कहा जाता है और जगन्नाथ जी के भोग में वहाँ के दही का विशेष स्थान है*।
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