शब्द ब्रह्म हैं -
हमारे वेद कहते हैं कि शब्द ब्रह्म होते हैं। वाणी केवल संवाद का माध्यम नहीं है। वह एक शक्ति है। एक ऊर्जा है। जो बोला जाता है, वह केवल हवा में नहीं घुलता बल्कि वह हमारे भीतर उतरता है, हमारी चेतना को आकार देता है, और धीरे-धीरे हमारी वास्तविकता बन जाता है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने वाणी को इतना महत्व दिया। मंत्र केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे। वे चेतना को जगाने के वैज्ञानिक उपकरण थे। आधुनिक मनोविज्ञान भी अब यही कह रहा है जो वेदांत हज़ारों वर्षों से कहता आया है। हम जो बार-बार बोलते हैं, वह हमारा अवचेतन मन सत्य मान लेता है। अगर आप रोज़ कहते हैं – मैं थका हुआ हूं, मेरे साथ हमेशा बुरा होता है, मुझसे नहीं होगा, तो आपका मन इसे सच मानकर उसी दिशा में काम करने लगता है। और जो मन मानता है, जीवन वैसा ही बनने लगता है। यह कोई रहस्यवाद नहीं है। यह चेतना का स्वभाव है।
इसका उलटा भी उतना ही सत्य है। जो लोग अपने बारे में, अपने जीवन के बारे में, अपनी संभावनाओं के बारे में सकारात्मक और सजग भाव से बोलते हैं, उनके जीवन में एक अलग ही ऊर्जा दिखती है। वे अधिक आत्मविश्वासी होते हैं, अधिक स्थिर होते हैं। क्योंकि उनके शब्द उन्हें तोड़ते नहीं, गढ़ते हैं। पर यहां एक सूक्ष्म बात समझनी होगी। शब्दों की शक्ति केवल बाहर बोले गए शब्दों तक सीमित नहीं है। भीतर जो संवाद चलता रहता है, वह मन की आंतरिक वाणी, वह और भी अधिक प्रभावशाली है। हम दिनभर अपने आप से क्या कहते हैं? मैं कमज़ोर हूं, मैं अयोग्य हूं, कोई मुझे नहीं समझता, तो यह भीतरी शब्द बाहरी शब्दों से कहीं अधिक गहरे घाव करते हैं। और इसीलिए आत्म-ज्ञान की साधना में सबसे पहला कदम है – अपनी भीतरी वाणी को सुनना और उसे परिष्कृत करना।
तो करना क्या है? बहुत सरल है। पहले सजग होइए। अपने शब्दों को सुनिए, बाहर के भी, भीतर के भी। जब भी नकारात्मक शब्द उठें, एक पल रुकिए। उन्हें बदलिए। यह नाटक नहीं है, यह साधना है। धीरे-धीरे यह अभ्यास एक नई आदत बनेगा। और वह आदत एक नया जीवन बनाएगी। हमारे पूर्वज कहते थे कि मुख से वही निकालो जो सत्य हो, प्रिय हो और हितकर हो। यह केवल नैतिक उपदेश नहीं था। यह जीवन जीने की सबसे गहरी कला थी।
शब्द बीज हैं। जो बोओगे, वही उगेगा।
इसलिए सोचकर बोलिए। क्योंकि आपके शब्द ही आपका भविष्य लिख रहे हैं।
*जै श्री राम।*🙏🚩🇮🇳🕉️
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