मायका, यानी "माँ यह क्या" ?
मायका, यानी "माँ यह क्या" ?
कल बहुत लंबे समय के बाद अपने एक पुराने मित्र के यहां अचानक जाना हुआ, जाते ही देखता हूं तो क्या कि उसकी बेटी और नातिन आए हुए है। घर का सारा माहौल ही बदला हुआ था। सारी बातों का केंद्र चार साल की नातिन ही बनी हुई थी। मानो दोस्त और भाभी जी की बातों में सिवाय उसकी नई-नई उपलब्धियों के अलावा कुछ और विषय बातचीत के लिए थे ही नहीं....! यार, साल भर इंतजार के बाद यह सुनहरा समय आता है, फिर इनके चले जाने के बाद यादों के सहारे ही हम एक साल काट पाते हैं.....!
मैंने भी दोस्त से कहा की हम भी अभी-अभी इसी दौर से गुजरे हैं। मेरी भी दोनों बेटियां और नातिन हफ्ते भर के लिए मायके आई थी और हमने भी इस दौरान इसी आनंद को अनुभव किया । गर्मी की छुट्टियां यानी मायके का समय होता है। हमें भी अपने पुराने दिन याद आते हैं, जब गर्मी की छुट्टी में मां के साथ मामा जी के घर जाया करते थे। आप यकीन मानिए कि सारे रिश्तेदारों के घर एक तरफ और ननिहाल एक तरफ होता है।
बच्चों के घर आने से कई दिन पहले से ही प्लानिंग शुरू हो जाती है, विशेषकर ऐसी चीज जो साल भर में एक बार ही बनती है, उनको बनाने के लिए यह उपयुक्त समय होता है। बच्चों के आने के बाद कहां घूमने जाना है ? क्या-क्या चीजे नाश्ते खाने में बननी है, (इसमें नाती पोतों की पसंद का विशेष ध्यान रखा जाता है) पर विचार होता है। विदाई के समय बच्चों को क्या उपहार देना है ? उसके घर वालों के लिए क्या भिजवाना है ? आदि मुख्य रूप से चर्चा के विषय होते हैं।
इस बार मेरी बेटियों के मायके प्रवास के दौरान मैंने जाना कि अब मेरी नातिन बड़ी हो गई है। अब तक जब भी वह आई तो मुझसे गाय बकरी दिखाने के लिए ले जाने की जिद किया करती थी। महानगरों में तो बच्चे इन सब चीजों के लिए तरस जाते हैं। रोज सवेरे गाय को रोटी देना, उसकी दिनचर्या का हिस्सा होता था। परंतु इस बार उसने इन सब बातों में कोई रुचि नहीं दिखाई। उसने इस प्रकार की कोई जिद नहीं की बल्कि हमारे आस पड़ोस में रहने वाली उसके ही उम्र की लड़कियों के साथ दिनभर खेलने में व्यस्त रही। चंद दिनों में उनकी दोस्ती इतनी गहरी हो गई थी कि जाने वाले दिन सवेरे से ही उसकी सहेलियां हमारे घर पर मौजूद थी। बिछड़ते समय एक दूसरे के गले मिलकर उनकी आंखों को नम होते हुए भी मैंने देखा। अगली बार जल्दी आकर दोबारा मिलने के वादे के साथ ही उनका बिछड़ना हुआ। बाद में जब मैंने अपनी नातिन से इस बारे में चर्चा की तो उसने कहा कि नाना जी, हम सब लोगों को बड़ी सैड फीलिंग आ रही थी।
विवाहित लड़कियों का कुछ समय के लिए मायके आना कोई जगह का बदलाव नहीं बल्कि सुकून, अपनापन और पुरानी यादों को दोबारा जीने का एक एहसास है।
मायका वह जगह है जहां बेटियों को बिना शर्त प्यार मिलता है जो उन्हें कुछ समय के लिए ही सही पर अपने विवाहित जीवन की जिम्मेदारियां को भूल कर दोबारा बचपन को जीने का अवसर देता है।
मायके आने से अपने पुराने कमरे, पुरानी चीजो के बीच बचपन की सहेलियों और मां के हाथ का लजीज खाना खाकर अतीत की मीठी यादें ताजा हो जाती है। जिम्मेदारियां का एहसास कुछ समय के लिए न होने से बे रोक टोक देर तक सोने का आनंद भी मायके में ही तो मिलता है। सारा घर इन परियों के इशारों पर ही नाचता रहता है।
"मायका" शब्द ऐसा है जो शादी के बाद ही अस्तित्व में आता है और हां जब, तक माँ है तभी तक मायके के मायने रहते हैं। उसके बाद तो यह सिर्फ एक सुनहरी यादों की भौतिक वास्तु रह जाती है।
मायका याने बेटी की नजरों में "माँ यह क्या ...?"
बेटी के मायके आने के पहले से जाने के दिन तक मां हर वह चीज दौड़ दौड़ कर करती है जो उसे अपनी बेटी को खाने, पिलाने और दिलाने की इच्छा होती है और हर बार बेटी को लगता है कि "माँ यह क्या कर रही हो", अब बस भी करो...! कितना करोगी, परंतु माँ का मन है कि मानता ही नहीं....! बस बेटा यह और खा लो, इतना और तुम्हारे साथ जाते समय बांध दूंगी....! फिर भी इस बार यह तो रह ही गया बेटा...! अमूमन यही सब बातें गर्मी की छुट्टियों में सभी परिवारों में दिखाई सुनाई देती है।
मां बाप के लिए बेटियों के मायके आने के पहले की उत्सुकता, उनके साथ समय बिताने के दौरान की खुशी और जाने के बाद अगली बार जल्दी दोबारा आने का विश्वास, बस इन्हीं सब बातों में ही तो समाया है, उनके आने का आनंद.....!
दोस्त की तरह हमे भी अगली गर्मी की छुट्टियां का इंतजार रहेगा बेटा, .....!!
"परिवर्तन"
डॉ. मुकुंद फाटक, भोपाल
9584216075
25/6/2026
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