हमारा युवा पीढ़ियां बदल रहा है

हत्या सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं होती… उसके साथ कई परिवार उम्र भर के लिए मर जाते हैं।”

पिछले कुछ समय से लगातार ऐसी ख़बरें सामने आ रही हैं जहाँ किसी लड़की ने अपने मंगेतर या पति की हत्या कर दी। हर घटना के बाद हम किसी एक व्यक्ति को खलनायक बना देते हैं, सोशल मीडिया अदालत बन जाता है, और कुछ दिनों बाद अगली ख़बर आ जाती है।

लेकिन क्या हम कभी ठहरकर यह सोचते हैं कि ऐसी त्रासदियों की शुरुआत कहाँ से होती है?

मुझे लगता है कि कहीं न कहीं हम माता-पिता भी इस कहानी का हिस्सा हैं। दोषी नहीं, लेकिन ज़िम्मेदार ज़रूर।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि बच्चों को जन्म देना, उन्हें पढ़ाना-लिखाना और संस्कार देना हमारी ज़िम्मेदारी है, लेकिन एक उम्र के बाद उनकी ज़िंदगी पर हमारा अधिकार नहीं रह जाता। हम उन्हें समझा सकते हैं, अनुभव बाँट सकते हैं, सही-गलत बता सकते हैं, लेकिन उनके लिए ज़िंदगी नहीं जी सकते।

अगर कोई बेटा या बेटी शादी के लिए तैयार नहीं है, तो शायद हमें उसकी “ना” सुननी सीखनी होगी। अगर उसे किसी और के साथ जीवन बिताना है, तो हमें उसके निर्णय को समझने की कोशिश करनी होगी। ज़बरदस्ती से बने रिश्ते अक्सर बाहर से सुंदर दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से टूट चुके होते हैं।

आज की पीढ़ी का जीवन देखने का नज़रिया बदल चुका है। वे कहते हैं—“मेरी ज़िंदगी, मेरा तरीका।” हो सकता है हमें यह पसंद न आए, लेकिन यह एक सच्चाई है। इस सच्चाई से आँखें बंद कर लेने से वह बदल नहीं जाएगी।

इसका मतलब यह नहीं कि हर निर्णय सही होगा। बच्चे भी गलतियाँ करेंगे, कभी बहुत बड़ी गलतियाँ भी। लेकिन अगर बचपन से घर ऐसा बनाया जाए जहाँ वे बिना डर के अपनी उलझन, अपना प्रेम, अपनी नापसंद, अपना डर और अपनी गलतियाँ भी माँ-बाप से साझा कर सकें, तो शायद कई रिश्ते टूटने से पहले संभल जाएँ। कई अपराध होने से पहले रुक जाएँ।

जब बच्चे यह मान लेते हैं कि “मम्मी-पापा मुझे समझेंगे ही नहीं”, तब वे अपनी ज़िंदगी के सबसे बड़े फ़ैसले घर से छिपकर लेने लगते हैं। और छिपकर लिए गए निर्णय कई बार ऐसी दिशाओं में चले जाते हैं जहाँ से लौटना संभव नहीं होता।

सबसे दुखद बात यह है कि ऐसी घटनाओं में सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं मरता। एक परिवार अपना बेटा खो देता है। दूसरा परिवार अपनी बेटी को ज़िंदा होते हुए भी उम्रकैद या सामाजिक शर्मिंदगी में खो देता है। दोनों घरों की हँसी हमेशा के लिए बदल जाती है।

इसलिए शायद अब समय आ गया है कि हम अपने बच्चों के सिर्फ़ अभिभावक नहीं, उनके दोस्त भी बनें। ऐसे दोस्त, जिनसे वे यह कह सकें—“मुझे यह रिश्ता नहीं चाहिए” या “मैं उलझ गया हूँ”—बिना इस डर के कि उन्हें केवल डाँट या दबाव मिलेगा।

यह लेख किसी एक घटना, किसी एक लड़की, किसी एक लड़के या किसी एक परिवार के बारे में नहीं है। यह एक बदलते समाज के बारे में है। एक ऐसे समय के बारे में, जहाँ रिश्ते आदेश से नहीं, संवाद से चलते हैं।

शायद हमें अपने बच्चों को नियंत्रित करने की कोशिश कम और उन्हें समझने की कोशिश ज़्यादा करनी चाहिए।

क्योंकि कई बार एक खुली बातचीत… एक पुलिस केस, एक हत्या और दो बर्बाद परिवारों से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली होती है।

— निखिल कपूर
Lamhe Zindagi Ke

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