वीसीआर और सुनहरा दौर
सन 80 और 90 के दशक में वीसीआर पर फिल्में देखना एक अलग ही अनुभव हुआ करता था। जब किसी घर में किराए पर वीसीआर मंगाया जाता था, तो पूरे मोहल्ले या गाँव में इसकी चर्चा हो जाती थी। 50-60 रुपये में वीसीआर के साथ दो या तीन फिल्मों की कैसेट मिल जाती थीं और फिर रात भर मनोरंजन का दौर चलता था।📺
वीसीआर आने में अगर थोड़ी भी देर हो जाती, तो लोग दरवाजे के बाहर खड़े होकर उसका इंतजार करते रहते थे। जैसे ही वीसीआर वाला पहुँचता, बच्चों के चेहरे खिल उठते थे। दिलचस्प बात यह थी कि वीसीआर चलाने वाले व्यक्ति का भी खूब सम्मान किया जाता था। उसे बार-बार चाय, नाश्ता और खाने के लिए पूछा जाता था, क्योंकि वही तो पूरी रात फिल्मों का जादू चलाने वाला होता था।💫
फिर शुरू होता था फिल्मों का सिलसिला - एक्शन, रोमांस, कॉमेडी और आखिर में कोई डरावनी फिल्म। परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी और दोस्त सब एक साथ बैठकर फिल्में देखते थे। आज की तरह हर किसी के हाथ में मोबाइल नहीं था, इसलिए मनोरंजन भी सामूहिक होता था और उसका आनंद भी कई गुना ज्यादा होता था।🙌
वह दौर सिर्फ फिल्में देखने का नहीं, बल्कि लोगों के एक-दूसरे के करीब आने का भी था। पूरी रात जागना, बीच-बीच में चाय पीना, फिल्म के हीरो-हीरोइन पर चर्चा करना और सुबह होते-होते नींद से भरी आँखों के साथ घर लौटना - ये यादें आज भी चेहरे पर मुस्कान ले आती हैं।🤗
क्या आपके साथ भी वीसीआर का यह सुनहरा दौर गुज़रा है? बताइए, वीसीआर पर देखी गई वह कौन-सी फिल्म है जिसे आप आज तक नहीं भूले हैं?👍
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