सुमन कल्याणपुर जी 🙏
सुमन जी के पिता एक सारस्वत ब्राह्मण थे और मूलरूप से कर्नाटक के मंगलौर के चित्रापुर के रहने वाले थे। वो सभ्रान्त घराने से थे। और बैंक ऑफ़ इंडिया में ऊंचे पद पर काम करते थे। अपनी नौकरी के चलते उनका काफ़ी समय ढाका में बीता था। बाद में वो कोलकाता में भी रहे। वहीं पर 28 जनवरी 1937 को सुमन जी का जन्म हुआ था। सुमन जी की मां का नाम सीता हेमाडी था। छह भाई बहनों में सुमन सबसे बड़ी थी। इनकी चार बहनें व एक भाई थे।
वो साल 1942 था जब सुमन जी के पिता सपरिवार मुंबई आ गए थे। संगीत और चित्रकारी में सुमन हेमाडी जी को बचपन से ही बहुत दिलचस्पी थी। सेंट कोलंबिया हाईस्कूल से अपनी स्कूलिंग पूरी करने के बाद सुमन जी ने जे.जे. कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स में दाखिला ले लिया। इसी दौरान ही केशवराव भोले से उन्होंने संगीत भी सीखना शुरू कर दिया। केशवराव भोले उनके पारिवारिक मित्र थे और प्रभात फ़िल्म कंपनी में बहैसियत संगीतकार भी काम करते थे।
एक इंटरव्यू में सुमन जी ने बताया था कि उन्होंने बस यूं ही, शौकिया तौर पर केशवराव भोले जी से संगीत सीखना शुरू किया था। मगर बाद में उन्हें संगीत से लगाव हो गया। वो संगीत को लेकर गंभीर होने लगी। फिर तो उन्होंने उस्ताद ख़ान अब्दुल रहमान ख़ान व गुरूजी मास्टर नवरंग से संगीत की विधिवत शिक्षा ली। वैसे तो सुमन जी के घर में सभी को संगीत व कला से लगाव था। लेकिन सार्वजनिक तौर पर किसी को भी गाने-बजाने की अनुमति उनके पिता ने नहीं दी थी। मगर फिर भी, जब साल 1952 में सुमन जी को ऑल इंडिया रेडियो पर गाने का प्रस्ताव मिला तो वो उसे ठुकरा नहीं सकी।
यानि सुमन जी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर रेडियो के लिए गायकी की थी। फिर अगले ही साल, 1953 में सुमन जी को शुक्रांची चांदनी नामक एक मराठी फ़िल्म में भी गाने का मौका मिला। मोहम्मद शफ़ी नामक एक संगीतकार उस फ़िल्म के गीत कंपोज़ कर रहे थे। उन्हीं दिनों शेख मुख़्तार भी मंगू नामक एक फ़िल्म प्रोड्यूस कर रहे थे। इत्तेफ़ाक से अपनी फ़िल्म मंगू के संगीत निर्देशन का ज़िम्मा भी शेख मुख़्तार ने मोहम्मद शफ़ी को ही दिया था।
मोहम्मद शफ़ी ने शेख मुख़्तार को शुक्रांची चांदनी फ़िल्म के लिए गाए सुमन जी के गीत सुनवाए। शेख मुख़्तार को सुमन जी की आवाज़ पसंद आई। और उन्होंने अपनी फ़िल्म मंगू में भी सुमन जी की आवाज़ इस्तेमाल की। सुमन जी ने मंगू फ़िल्म के लिए तीन गाने रिकॉर्ड किए। लेकिन इसी बीच जाने किन कारणों से मोहम्मद शफ़ी ने मंगू फ़िल्म छोड़ दी। उनकी जगह ओ.पी. नय्यर को मंगू का संगीत कंपोज़ करने का काम मिला। ओ.पी. नय्यर ने सुमन जी के गाए तीन में से दो गीतों को हटा दिया। सिर्फ़ एक लोरी 'कोई पुकारे तुझे धीरे से' ही रखी।
यूं साल 1954 की मंगू फ़िल्म से सुमन जी का पार्श्वगायन करियर स्टार्ट हो गया। हालांकि ये उनकी पहली रिलीज़्ड फ़िल्म नहीं थी। उनकी पहली रिलीज़्ड फ़िल्म थी दरवाज़ा, जो साल 1954 में ही आई थी। दरवाज़ा को उस वक्त की नामी लेखिका इस्मत चुगताई ने प्रोड्यूस व उनके पति शाहिद लतीफ़ ने डायरेक्ट किया था। और चूंकि दरवाज़ा फ़िल्म शेख मुख़्तार की मंगू से पहले रिलीज़ हुई थी, तो दरवाज़ा को ही सुमन जी की पहली फ़िल्म भी माना जाता है।
1954 में ही सुमन जी ने गुरूदत्त की फ़िल्म आर-पार के लिए भी एक गीत रिकॉर्ड किया। उस गीत में सुमन जी ने रफ़ी साहब व गीता दत्त जी के साथ गायकी की थी। उस गीत के बोल थे 'मोहब्बत कर लो जी भर लो, अजी किसने रोका है।' लेकिन इसके बाद सुमन जी ने फिर कभी ओ.पी. नय्यर के लिए कोई गीत नहीं गाया। दरअसल, सुमन जी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि इस गीत की इक्का-दुक्का लाइनों को छोड़ दें तो पूरे गाने में वो बस एक कोरस गायिका ही बनकर रह गई थी।
अब जानते हैं कि सुमन हेमाडी कैसे बनी थी सुमन कल्याणपुर। साल 1958 में सुमन जी की शादी रामानंद कल्याणपुर नाम मुंबई के एक बिजनेसमैन से हुई थी। उनसे शादी करके ही सुमन हेमाडी बनी थी सुमन कल्याणपुर। चूंकि सुमन जी की आवाज़ लता जी से बहुत मिलती थी, तो जब भी उस दौर के किसी गायक या संगीतकार के साथ लता जी की अनबन होती थी तो उसका फ़ायदा सुमन कल्याणपुर जी को मिलता था। लता जी से मिलती आवाज़ की वजह से सुमन कल्याणपुर जी को गाने के लिए बुलाया जाता था।
उस वक्त के लगभग सभी संगीतकारों संग सुमन जी ने काम किया था। रफ़ी साहब के साथ तो सुमन कल्याणपुर जी के गाए बहुत सारे गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे। लेकिन 1970 के दशक में जब भारतीय सिनेमाई संगीत में बदलाव की बयार चली, और कई नए गायक व संगीतकार सामने आए, तब सुमन कल्याणपुर जी के पास काम कम होने लगा। 1981 में आई नसीब फ़िल्म का एक गीत सुमन जी का आखिरी फ़िल्मी गीत साबित हुआ। उस गीत के बोल थे 'ज़िंदगी इम्तेहान लेती है।'
ऐसा नहीं है कि नसीब फ़िल्म के बाद सुमन कल्याणपुर जी को गाने के मौके नहीं मिले थे। कुछ और फ़िल्मों में भी उन्होंने गाया था। लेकिन कभी ऐसा हुआ कि वो फ़िल्में ही रिलीज़ नहीं हुई। और कभी ये भी हुआ कि सुमन जी की आवाज़ हटाकर किसी दूसरी गायिका से वो गाने गवा लिए गए। जैसे कि, गोविंदा की फ़िल्म लव 86. इस फ़िल्म में सुमन जी ने एक सोलो गीत गाया था। और मोहम्मद अज़ीज़ के साथ एक युगल गीत गाया था। लेकिन जब ये फ़िल्म रिलीज़ हुई तब उन गानों में सुमन कल्याणपुर जी की आवाज़ की जगह कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ सुनाई दी। ऐसा ही कुछ केतन देसाई की अल्लारक्खा फ़िल्म में भी सुमन कल्याणपुर जी के साथ हुआ था।
सन 2008 के किसी महीने में सुमन कल्याणपुर जी के पति रामानंद कल्याणपुर का देहांत हो गया था। उसके बाद से सुमन कल्याणपुर जी ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होना बंद कर दिया था। कभी-कभार वो किसी अवॉर्ड फंक्शन में नज़र आ जाती थी। लेकिन मीडिया से बातचीत करना उन्होंने बंद कर दिया था।
सुमन कल्याणपुर जी अब इस दुनिया से जा चुकी हैं। 31 मई 2026 को सुमन जी का देहांत हो गया। लेकिन उनके गीत सदा रहेंगे। उनकी आवाज़ सदा रहेगी।
—क़िस्सा टीवी
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