राधे राधे! 🙏🌸

🌸 श्री लाड़ली जू और निर्धन वृद्धा की मार्मिक कथा 🌸

बरसाना धाम में एक वृद्धा रहती थी। उसका कोई अपना नहीं था। न धन था, न परिवार। उसका जीवन केवल एक ही सहारे पर टिका था—श्री लाड़ली जू सरकार।

प्रतिदिन वह प्रातःकाल उठकर मंदिर के बाहर बैठ जाती और दूर से ही हाथ जोड़कर कहती—

"लाड़ली! मेरे पास तुम्हें चढ़ाने के लिए कुछ नहीं है, बस मेरा प्रेम स्वीकार कर लो।"

वृद्धा इतनी गरीब थी कि कई बार उसे स्वयं भोजन नहीं मिलता था, परन्तु मंदिर जाते समय वह एक फूल अवश्य ले जाती। कभी रास्ते से तोड़ा हुआ जंगली फूल, कभी तुलसी का एक पत्ता।

एक दिन वृद्धा बहुत बीमार पड़ गई। कई दिनों तक मंदिर नहीं जा सकी। बिस्तर पर लेटे-लेटे उसकी आँखों से आँसू बहते रहे।

वह रोते हुए बोली—

"हे बरसाने वाली! अब मेरे चरणों में इतनी शक्ति नहीं कि मैं तेरे दर्शन को आ सकूँ। लगता है इस बार बिना दर्शन किए ही प्राण निकल जाएंगे।"

उस रात उसे स्वप्न आया।

उसने देखा कि एक दिव्य किशोरी, गुलाबी वस्त्र धारण किए, मधुर मुस्कान के साथ उसके कक्ष में आई हैं। उनके मुख पर अद्भुत करुणा झलक रही थी।

उन्होंने वृद्धा का हाथ पकड़कर कहा—

"अरी माँ! तू क्यों रोती है? जब तू चलकर मेरे पास आती थी, तब मैं तेरी प्रतीक्षा करती थी। आज तू नहीं आ सकती, तो मैं स्वयं तेरे पास आ गई हूँ।"

वृद्धा की आँखों से अश्रुधारा बह निकली।

वह बोली—

"क्या आप मेरी लाड़ली जू हैं?"

दिव्य किशोरी मुस्कुराईं—

"हाँ माँ! मुझे तेरे फूल नहीं, तेरा प्रेम प्रिय है। संसार वाले धन देखते हैं, मैं हृदय देखती हूँ।"

इतना कहकर उन्होंने वृद्धा के सिर पर हाथ रखा।

प्रातः जब वृद्धा जागी, उसका मन अद्भुत शांति से भर गया था। बीमारी तो थी, पर अब कोई पीड़ा नहीं थी। उसके होंठों पर केवल एक ही नाम था—

"राधे... राधे... राधे..."

कुछ दिनों बाद उसी नाम का स्मरण करते हुए उसने शांतिपूर्वक देह त्याग दी।

बरसाना के संत कहते हैं—

"जो सच्चे हृदय से श्रीजी को पुकारता है, श्री लाड़ली जू उसे कभी अकेला नहीं छोड़तीं। भक्त एक कदम बढ़ाता है, श्रीजी सौ कदम बढ़ाकर उसके पास आ जाती हैं।"

🌺 संदेश:
श्री राधारानी को वैभव नहीं, भाव चाहिए।
जिस हृदय में निष्कपट प्रेम हो, वहाँ स्वयं बरसाने वाली लाड़ली जू निवास करती हैं।

राधे राधे! 🙏🌸

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