अमृत कथा*

*अमृत कथा*

रामायण के जिस 'ऋष्यमूक पर्वत' पर श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता हुई थी, क्या आप जानते हैं कि वह पर्वत असल में लाखों ऋषियों के शवों से बना था? 😳

⛰️ क्या आप जानते हैं 'ऋष्यमूक पर्वत' का निर्माण कैसे हुआ था? 🛕
हम सभी ने रामायण में 'ऋष्यमूक पर्वत' के बारे में अवश्य सुना है। मान्यता है कि यह पर्वत आज के कर्नाटक राज्य के हम्पी में स्थित है, जो रामायण काल की 'किष्किंधा नगरी' हुआ करती थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पर्वत के बनने के पीछे लाखों ऋषियों के बलिदान की एक अत्यंत मार्मिक कथा छिपी है? आइए जानते हैं... 👇
🩸 मूक ऋषियों का बलिदान और रावण का क्रोध
कथाओं के अनुसार, जब रावण के अत्याचारों से त्रिलोक त्राहि-त्राहि कर रहा था, तब संसार भर के लाखों ऋषियों ने श्रीहरि विष्णु को अवतार लेने के लिए विवश करने हेतु एक घोर तपस्या आरंभ की। उन्होंने निश्चय किया कि वे एक ही स्थान पर मौन (मूक) खड़े रहकर तपस्या करेंगे।
एक दिन रावण अपनी सेना के साथ वहाँ से गुज़रा। लाखों ऋषियों को मौन खड़ा देख उसने प्रश्न किए, किन्तु मौन व्रत के कारण किसी ने उत्तर नहीं दिया। रावण ने इसे अपना अपमान समझा और जब उसे पता चला कि ये तपस्या उसी के विनाश के लिए हो रही है, तो उसने अपनी सेना को सभी ऋषियों का वध करने का आदेश दे दिया।
🏔️ ऐसे पड़ा 'ऋष्यमूक' नाम
रावण की सेना ने असंख्य ऋषियों का वध कर दिया। उन लाखों ऋषियों के शवों के ढेर से एक विशाल पर्वत बन गया। चूँकि वह पर्वत मूक ऋषियों के शवों से बना था, इसीलिए उसका नाम "ऋष्यमूक" (या ऋषिमुख) पड़ा। यह पर्वत लंबे समय तक वीरान और श्रापित रहा, जिसे बाद में महर्षि मातंग ने अपना आश्रम बनाकर पवित्र किया।
⚡ बाली को श्राप और सुग्रीव का आश्रय
किष्किंधा के राजा बाली ने जब दुंदुभि नामक दैत्य का वध करके उसका शव फेंका, तो वह इसी पर्वत पर महर्षि मातंग के आश्रम के पास गिरा। रक्त की बूंदों से आश्रम अपवित्र हो गया। क्रोधित होकर महर्षि मातंग ने बाली को श्राप दिया कि यदि वह ऋष्यमूक पर्वत के एक योजन के क्षेत्र में आएगा, तो उसकी मृत्यु हो जाएगी।
यही श्राप सुग्रीव के लिए वरदान साबित हुआ! जब बाली और सुग्रीव में बैर हुआ, तो सुग्रीव ने अपने प्राण बचाने के लिए हनुमान जी और अन्य मंत्रियों के साथ इसी 'ऋष्यमूक पर्वत' पर शरण ली।
🤝 प्रभु श्रीराम से भेंट
इसी पवित्र पर्वत पर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जी पधारे थे, जहाँ हनुमान जी की सहायता से श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता हुई, जिसने रावण के अंत और धर्म की स्थापना की नींव रखी।
इतने ऋषियों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया; उनके तपोबल के कारण ही श्रीहरि ने राम अवतार लिया।
जय श्रीराम! 🚩 जय बजरंगबली! 🙏 यदि आपको यह अनसुनी कथा पसंद आई हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य शेयर करें।

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