मूंग की विदाई, बेसन की ताजपोशी
*सुदर्शन टुडे ब्यूरो बुरहानपुर*
गरीब का व्यंजन
कचौरी खाते ही मूंग दाल की महक मन मस्तिष्क में समा जाती थी वहीं हींग की हल्की सी महक स्वाद को राजशाही बना देती थी। आज की कचौरी में न स्वाद बचा न इसको स्वादिष्ट व्यंजन का जायका देने वाली मूंग की दाल बची न हींग! हाथ ठेले या चाय नाश्ते की दुकानों पर परोसे जाने वाली कचौरी में केवल तेल की भाप और बेसन का आत्मविश्वास ही महसूस होता है।
मारवाड़ और मध्य भारत की शान रही कचौरी आज बुरहानपुर मे अपनी पहचान के साथ स्वाद के संकट से जूझ रही है। महंगाई की मार है या दुकानदार का निजी स्वार्थ हलवाई ने कचौरी से मूंग दाल को चुपचाप बाहर का रास्ता दिखा दिया और उसकी जगह चने के बेसन ने स्थायी कब्जा जमा लिया है। मूंग अब कचौरी में नहीं, यादों में भी मुश्किल से मिलती है।
हींग, जो कभी कचौरी की आत्मा हुआ करती थी, अब सिर्फ नाम की हींग रह गई है—शायद दुकानदार - हलवाई हींग का फोटो दिखाकर ही काम चला रहे हैं। 3 से 5 रूपये की कचौरी 10 से 15 रुपये की होने के बाद भी स्वाद खोजना पड़ रहा है। स्वाद के नाम पर कचौरी और ग्राहक अब केवल तेल, मैदा और बेसन के त्रिकोण में फंसकर रह गया है !
स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो यह कचौरी नाश्ता नहीं,शरीर के साथ समझौता है। लेकिन क्या करें—महंगाई के इस दौर में स्वाद भी बजट देखकर ही परोसा जाने लगा है। शायद कचौरी अब पेट नहीं, जेब देखकर बनती है!
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