जीवन की अंतिम परीक्षा:

जीवन की अंतिम परीक्षा: आपका अगला जन्म कहाँ होगा?

क्या आपने कभी सोचा है कि मृत्यु के बाद हमारी चेतना, हमारा 'मैं' कहाँ जाता है? क्या अगला जन्म एक संयोग है, या इसके पीछे कोई गणित है?

शास्त्र और संत मत कहते हैं कि जीवन एक लंबी यात्रा है, और मृत्यु उस यात्रा का 'अंतिम पड़ाव' नहीं, बल्कि अगली यात्रा का 'टिकट' है। मनुष्य अगली योनि में कैसे प्रवेश करता है, यह कोई ईश्वरीय दंड या पुरस्कार नहीं, बल्कि हमारे ही मन की अंतिम दशा का परिणाम है।

यह नियम बिल्कुल सरल है: "जीवन भर जिसका ध्यान किया, अंत में वही गति प्राप्त हुई।"

संत त्रिलोचन जी, अपनी दिव्य दृष्टि से हमें सावधान करते हैं कि मृत्यु के क्षण में हमारे मन में जो चित्र सबसे गहरा होता है, हमारी आत्मा उसी ढांचे (शरीर) में ढल जाती है। आइए, इस रहस्य को उन उदाहरणों के माध्यम से समझते हैं जो उन्होंने दिए हैं:

१. धन का प्रहरी: सर्प योनि

> अंति कालि जो लछमी सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥

> सरप जोनि वलि वलि अउतरै ॥१॥
 
कल्पना कीजिए उस व्यक्ति की जिसने पूरा जीवन केवल धन जोड़ने, उसे गिनने और उसे छिपाकर रखने में बिता दिया। उसका प्रेम नोटों की गड्डी और सोने के सिक्कों से था। जब अंतिम समय आया, तो उसे परमात्मा याद नहीं आया, उसे चिंता थी—"मेरे जाने के बाद मेरी तिजोरी का क्या होगा?"

चूंकि उसका मन 'छिपे हुए खजाने' में अटका था, तो प्रकृति उसे ऐसा शरीर देती है जो खजाने की रक्षा के लिए ही बना हो। वह साँप बनता है। जैसे साँप कुंडली मारकर अपने बिल या खजाने पर बैठता है और किसी को पास नहीं आने देता, वही वृत्ति उस जीव को सर्प योनि में खींच ले जाती है।

२. वासना का बंधन: वेश्या योनि

> अंति कालि जो इसत्री सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥

> बेसवा जोनि वलि वलि अउतरै ॥२॥

यह उदाहरण केवल स्त्री के लिए नहीं, बल्कि कामुकता और देह-आसक्ति के लिए है। यदि कोई पुरुष या स्त्री, जीवन भर केवल भोग-विलास, शारीरिक आकर्षण और काम-वासना के विचारों में ही डूबा रहता है, और मरते समय भी उसके मन में वासना का ही चित्र है, तो उसका अगला जन्म बहुत कष्टकारी होता है।

संत त्रिलोचन कहते हैं कि ऐसा जीव वेश्या (या ऐसे जीवन जहाँ देह का व्यापार हो) के रूप में जन्म लेता है। जहाँ शरीर तो मिलता है, लेकिन सम्मान नहीं; और आत्मा फिर उन्ही वासनाओं के जाल में तड़पती रहती है।

३. मोह का कीचड़: शूकर (सूअर) योनि

> अंति कालि जो लड़के सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥

> सूकर जोनि वलि वलि अउतरै ॥

संतान से प्रेम होना स्वाभाविक है, लेकिन 'मोह' (Blind Attachment) घातक है। जो व्यक्ति परमात्मा को भूलकर, दिन-रात केवल अपने बच्चों के मोह में, उनके लिए सही-गलत तरीके से संसाधन जुटाने में और केवल 'मेरा परिवार, मेरा वंश' की रट में लगा रहता है, उसकी चेतना संकुचित हो जाती है।

सूअर एक ऐसा प्राणी है जो अपने परिवार (ढेर सारे बच्चों) और गंदगी (कीचड़) में ही मग्न रहता है। यदि मरते समय चित्त केवल बच्चों में फंसा रह गया, तो जीव उस चेतना के स्तर पर गिर जाता है जहाँ उसे सूअर की योनि प्राप्त होती है, जहाँ केवल और केवल 'परिवार बढ़ाना' ही जीवन का लक्ष्य रह जाता है।

४. ईंट-पत्थरों का कैदी: प्रेत योनि

> अंति कालि जो मंदर सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥

> प्रेत जोनि वलि वलि अउतरै ॥

कई लोगों को अपने बनाए मकान, हवेली या महल से इतना प्यार होता है कि वे सोचते हैं, "मैंने एक-एक ईंट अपनी मेहनत से लगाई है।" वे शरीर छोड़ना ही नहीं चाहते क्योंकि उनका मन उस मकान के कोनों में अटका होता है।

मृत्यु के बाद, ऐसे व्यक्ति को नया शरीर नहीं मिलता। उनकी आसक्ति उन्हें उसी घर के आस-पास प्रेत बनाकर भटकाती रहती है। वे न तो इस लोक के रहते हैं, न परलोक के। वे अपने ही बनाए महल के अदृश्य चौकीदार बन जाते हैं।

तो फिर उपाय क्या है? क्या हम अंत समय में अपने मन को नियंत्रित कर सकते हैं?

संत त्रिलोचन अंतिम पद में "मास्टर-की" (Master Key) देते हैं:

> अंति कालि नाराइणु सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥

> बदति तिलोचनु ते नर मुकता पीत्मबरु वा के रिदै बसै ॥
 
उत्तर है—नारायण (परमात्मा) का स्मरण।

जो व्यक्ति जीवन भर अभ्यास करता है कि "यह धन, यह परिवार, यह शरीर सब किराए का है, मेरा असली घर तो परमात्मा है," केवल वही अंतिम श्वास में भगवान को याद कर पाता है।

जब अंतिम विचार 'उस अनंत' (God) का होता है, तो आत्मा किसी सीमित शरीर (साँप, सूअर, प्रेत) में नहीं बंधती। वह पानी की बूंद की तरह सागर में मिल जाती है। उसके हृदय में स्वयं पीतांबरधारी (श्री हरि) का वास हो जाता है। वह जीवन-मुक्त हो जाता है।

मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक 'रिजल्ट' है। हम आज, अभी जो सोच रहे हैं, जिस चीज से जुड़ रहे हैं, हम अपनी अगली योनि का निर्माण कर रहे हैं। फैसला आपके हाथ में है—आपको साँप, प्रेत या सूअर बनना है, या परमात्मा में लीन होना है?

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