कानों को ठंड से बचाना

*कानों को ठंड से बचाना जीवन रक्षा है*

*कान हमारे शरीर की खिड़कियां हैं*

सर्दियों की दस्तक होते ही हम भारी जैकेट और दस्ताने तो निकाल लेते हैं और कानों को खुला छोड़ देते हैं। 
 हमारे कान केवल सुनने के अंग नहीं हैं, बल्कि वे शरीर के 'थर्मोस्टेट' (तापमान नियंत्रक) की सबसे महत्वपूर्ण  कड़ी हैं।

 चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद दोनों ही मानते हैं कि कानों के जरिए घुसने वाली ठंड सीधे हमारे मस्तिष्क और हृदय प्रणाली को प्रभावित कर सकती है।

कानों को ढकना हमारी सेहत के लिए 'सुरक्षा कवच' की तरह काम करता है।

क्यों है कानों को बचाना इतना जरूरी इसलिए है कि कान की बनावट में मांसपेशियों या वसा (Fat) की कोई सुरक्षात्मक परत नहीं होती। 
यहाँ की त्वचा के ठीक नीचे तंत्रिकाओं (Nerves) का जाल होता है। 
जब ठंडी हवा सीधे कान के पर्दे और नलिका से टकराती है, तो यह शरीर के 'कोर टेम्परेचर' को तेजी से गिरा सकती है जिससे 'थर्मल शॉक' का खतरा बढ़ जाता है।

 कानों के पीछे 'वेगस नर्व' (Vagus Nerve) की शाखाएं होती हैं। यहाँ अत्यधिक ठंड लगने पर यह नस उत्तेजित हो जाती है, जिससे अचानक चक्कर आना (Vertigo) या सिरदर्द शुरू हो सकता है।

जब ठंडी हवा में कानों को खुला रखते हैं, तब कान की नली में रक्षा तंत्र के रूप में अतिरिक्त हड्डी बढ़ने लगती है। इसे 'सर्फर्स ईयर' (Surfer’s Ear) कहते हैं, जो सुनने की क्षमता कम कर सकता है।

चेहरे का लकवा (Bell’s Palsy): कड़ाके की ठंड में कान के पीछे से गुजरने वाली 'फेशियल नर्व' में सूजन आ सकती है। इससे चेहरे के एक तरफ की मांसपेशियों में अस्थायी लकवा होने का खतरा रहता है।

 आयुर्वेद के अनुसार, कानों का सीधा संबंध 'वात' दोष से है। कानों में ठंड लगने से पेट में गैस, मरोड़ और अपच की समस्या अचानक बढ़ सकती है।

 कान ठंडे होने पर शरीर की नसें संकुचित हो जाती हैं। यह संकुचन ब्लड प्रेशर को अचानक 10-15 पॉइंट बढ़ा सकता है, जो बुजुर्गों के लिए खतरनाक है।

कान के भीतर 'इन्नर ईयर' में तरल पदार्थ होता है जो शरीर का संतुलन (Balance) बनाए रखता है। अत्यधिक ठंड इस तरल के दबाव को प्रभावित कर सकती है, जिससे चलते समय लड़खड़ाने का अहसास हो सकता है।

कई बार  लगता है कि दांत में कैविटी है, लेकिन असल में वह कान की नसों में ठंड लगने के कारण होने वाला 'रेफर्ड पेन' होता है।

कान ठंडे रहने से शरीर की ऊर्जा केवल उन्हें गर्म रखने में खर्च होती है, जिससे संक्रमण से लड़ने वाली सफेद रक्त कोशिकाएं (WBC) कमजोर पड़ जाती हैं।

 ठंड में कान का वैक्स (Earwax) सख्त हो जाता है, जिससे कान में खुजली और संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है।

कानों से जाने वाली ठंडी हवा सीधे 'सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम' को सक्रिय कर देती है, जिससे बिना कारण घबराहट और बेचैनी महसूस होने लगती है।

*बचाव*
 मफलर को इस तरह लपेटें कि कान पूरी तरह ढके रहें।

यदि बहुत ज्यादा हवा चल रही है, तो कानों में हल्की रुई (Cotton ball) डालना एक प्रभावी 'विंड-ब्रेकर' का काम करता है।

 नहाने के बाद कान के बाहरी हिस्से और पीछे तेल की एक बूंद लगाएं। यह एक 'इंसुलेटिंग लेयर' बनाता है।

 कान हमारे  शरीर की खिड़कियां हैं। यदि इनसे ठंडी हवा अंदर आएगी, तो पूरे 'घर का तापमान बिगड़ जाएगा ।इसलिए सतर्क रहे सुरक्षित रहें।
🙂🙂

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