ज़िंदगी को उत्सव बनाइये,

।। ज़िंदगी को उत्सव बनाइये, मृत्यु महोत्सव हो जाएगी ।।

बचपन में लगता है पढ़-लिख लूँ तो फलाँ नौकरी या व्यापार कर लूँगा। उसमें सफल हो गया तो बंगला, कार ले लूँगा। बंगला, कार आ जाएगा तो...ऐसे हज़ार नए सपने, हजारों नई उम्मीदें! 'चचा गालिब कहते हैं हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले; बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।'

मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह वक़्त निकलता चला जाता है। पता ही नहीं चलता है और ज़िन्दगी की पारी ख़त्म हो जाती है। हम ज़िंदगी को तीन भागों में बाँटें तो बीस साल की उम्र तक हमारे पास एनर्जी तो होती है पर समय और पैसा नहीं होता। बीस साल से साठ साल तक की उम्र में एनर्जी भी रहती है पैसा भी पर समय नहीं रहता है। साठ साल के बाद पैसा भी रहता है, समय भी रहता है पर एनर्जी नहीं रहती। जिन्दगी जीने का सही फार्मूला यही है। कि 20 से 60 तक व्यक्ति के पास पैसे और एनर्जी तो हैं ही। टाइम मैनेजमेंट कर के कुछ अतिरिक्त समय चुराकर निकाल लिया जाए और ज़िन्दगी का आनंद भी लिया जाए। एक ज़रूरी काम और! 20 से 60 के बीच खान-पान और व्यायाम से शरीर को इतना फिट बना लेना चाहिए कि बाद में जब समय और पैसा रहे तो एनर्जी की कमी क़तई महसूस ना हो।

बेहतर ज़िन्दगी की अगर कोई परिभाषा हो तो मैं कहना चाहूँगा कि चार चीजें चाहिए; मनचाहा करने की आजादी, समय, ऊर्जा और पैसा। विदेशों में लाइफ़ स्टाइल कुछ ऐसी है कि लोग एक उम्र के बाद ख़ुद ही अपने काम से रिटायर हो जाते हैं। उन्हें एहसास होता है कि जिंदगी एक ही है। इसे महज़ काम करते हुए नहीं गँवा सकते।

हम हिन्दुस्तानी पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं इसलिए ज़्यादा शिकायत नहीं करते। यदि दुकान पर बैठते हैं तो पूरी उम्र वहीं बैठकर ही निकाल देंगे और दुकान से जब निकलते हैं तो चार कंधों पर ही निकलते हैं। जीने का यह तरीका गलत है। जीवन में रोमांच और उत्साह होना चाहिए। इसके लिए ज़रूरी यह है कि जिंदगी में होश रखा जाए और लक्ष्य निर्धारित किए जाएँ। बेहोशी से जीते-जीते लोग अपने आप को एक दिन अस्पताल में पाते हैं। जब होश आता है तो सोचते हैं हाय! हमने जिंदगी के साथ ये क्या किया।

दुनिया में दो तरह के लोग मिलते हैं। कुछ ऐसे जिनके पास सब कुछ है फिर भी कुछ और...कुछ और के लिए दुःखी हैं। अनावश्यक लालसा वाला व्यक्ति हमेशा भूखा रह जाता है। कुछ इंसान ऐसे भी मिल जाते हैं जो भोगते कम है और भुगतते ज़्यादा हैं फिर भी जिंदगी से ऐसे लबरेज़ नज़र आते हैं कि भुगता हुआ भी भोगा हुआ नज़र आता है।

इसलिए रास्ते में ख़ूबसूरत फूल दिखें तो उन्हें निहारने का आनंद वहीं उठा लो। सफर पूरा करने की जल्दी में ये ख़ुशी हाथ से निकल जाएगी। ख़ुशी कोई साकार वस्तु नहीं जो एक दिन करीने से पैक किए हुए पार्सल में हम तक पहुँचेगी...ख़ुशियाँ तो बिखरी पड़ी हैं। हमारे चारों ओर...बहुत सामान्य सी दिखने वाली घटनाओं में...। इनका भरपूर आनंद उठाइये, खुशियों की खेती कीजिए...खुशी रेडीमेड नहीं; टेलर मेड शर्ट है...इसकी सिलाई हमें स्वयं करवाना होती है...। प्रसन्नता कोई स्टेशन नहीं है जहाँ आपको पहुँचना ही है, वह तो बिना पते के शहर की यात्रा है। उसका आनंद लेना हो तो बिना रिज़र्वेशन किए डिब्बे में बैठ जाइये !

"तमन्ना ने ज़िंदगी की गोद में सर रखकर पूछा मैं कब पूरी होऊँगी ? ज़िंदगी ने मुस्कराकर कहा...जो पूरी हो जाए वो तमन्ना ही क्या ?"

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