कर्म की फल......

पुलस्त्य ऋषि के वँशज और  ऋषि  विश्रवा का पुत्र रावण सर्व शक्तिमान था, सभी देवीय शक्तियां उसके अधीन थीं।  लेकिन उसके राक्षसी कर्मों ने उसके खानदान सहित अंत करा दिया।  दुर्योधन ने एक अबला स्त्री को दिखा कर अपनी जंघा ठोकी थी, तो भीम द्वारा  उसकी जंघा तोड़ कर दो हिस्से में चीर कर मार डाला गया । दु:शासन ने छाती ठोकी तो उसकी छाती फाड़ दी गयी उसकी छाती फाड़कर  द्रोपदी ने अपने बाल उसके रक्त से धोये थे । 
महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, उसने मरते हुए असहाय अभिमन्यु को पानी माँगने पर पानी देने से मना कर दिया था  तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया। 
भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखा । 
सजा तो पाँडवों को भी मिली,, उन्होनें एक असहाय स्त्री को जुऐं में दाँव पर लगाया।  
स्त्री की अस्मिता दाँव पर लगने का फल अश्वत्थामा द्वारा सोते में  पाँडव पुत्रों की हत्या में हुआ। अश्वत्थामा, भगवान श्रीकृष्ण के श्राप से माथे पर घाव लेकर अभी तक घूम रहा है।  
इसीलिये कहा गया है कि
 "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहिं सो तस फल चाखा, 
सकल पदारथ है जग माहिं, कर्म हीन नर पावत नाहीं " 
 -   जय जय

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