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कोई लौटा दे.. मेरे बीते हुए दिन।।

: हमारे बचपन में कपड़े तीन टाइप के ही होते थे ••• स्कूल का ••• घर का ••• और किसी खास मौके का •••    अब तो ••• कैज़ुअल, फॉर्मल, नॉर्मल, स्लीप वियर, स्पोर्ट वियर, पार्टी वियर, स्विमिंग, जोगिंग, संगीत ड्रेस, फलाना - ढिमका ••• जिंदगी आसान बनाने चले थे ••• पर वह कपड़ों की तरह कॉम्प्लिकेटेड हो गयी है •••!  बचपन में पैसा जरूर कम था पर साला उस बचपन में दम था" . "पास में महंगे से मंहगा मोबाइल है पर बचपन वाली गायब वो स्माईल है" . "न गैलेक्सी, न वाडीलाल, न नैचुरल था, पर घर पर जमीं आइसक्रीम का मजा ही कुछ ओर था" . अपनी अपनी बाईक और  कारों में घूम रहें हैं हम पर किराये की उस साईकिल का मजा ही कुछ और था "बचपन में पैसा जरूर कम था पर यारो उस बचपन में दम था *कभी हम भी.. बहुत अमीर हुआ करते थे* *हमारे भी जहाज.. चला करते थे।* *हवा में.. भी।* *पानी में.. भी।* *दो दुर्घटनाएं हुई।* *सब कुछ.. ख़त्म हो गया।*                 *पहली दुर्घटना*  जब क्लास में.. हवाई जहाज उड़ाया। टीचर के सिर से.. टकराया। स्कूल से.. निकलने की नौबत आ गई। बहुत फजीहत हुई। कसम दिलाई...

𝗔𝗡𝗜𝗧𝗬𝗔𝗠 𝗔𝗦𝗨𝗞𝗛𝗔𝗠 𝗟𝗢𝗞𝗔𝗠 🌿 — 𝘉𝘩𝘢𝘨𝘢𝘷𝘢𝘥 𝘎𝘪𝘵𝘢 9.33

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🌿 𝗔𝗡𝗜𝗧𝗬𝗔𝗠 𝗔𝗦𝗨𝗞𝗛𝗔𝗠 𝗟𝗢𝗞𝗔𝗠 🌿              — 𝘉𝘩𝘢𝘨𝘢𝘷𝘢𝘥 𝘎𝘪𝘵𝘢 9.33 This is one of the most powerful verses of the Bhagavad Gita, summarising the nature of the material world. 𝘈𝘯𝘪𝘵𝘺𝘢𝘮 — 𝘐𝘮𝘱𝘦𝘳𝘮𝘢𝘯𝘦𝘯𝘵 𝘈𝘴𝘶𝘬𝘩𝘢𝘮 — 𝘐𝘯𝘤𝘢𝘱𝘢𝘣𝘭𝘦 𝘰𝘧 𝘨𝘪𝘷𝘪𝘯𝘨 𝘭𝘢𝘴𝘵𝘪𝘯𝘨 𝘫𝘰𝘺 𝘓𝘰𝘬𝘢𝘮 — 𝘛𝘩𝘦 𝘸𝘰𝘳𝘭𝘥 𝘸𝘦 𝘦𝘹𝘱𝘦𝘳𝘪𝘦𝘯𝘤𝘦 Lord Krishna makes it clear: nothing in this changing world can provide permanent happiness. However, Krishna is not saying there is no happiness. He is awakening us to reality.... reality that everything is bound to change. People change. Situations change. Even our feelings change — One moment we feel hopeful, loving, inspired and happy. Another moment, the same situation feels different. What once gave joy may later give pain. And this is true for relationships, possessions, achievements and circumstances. The problem is not enjoyment, dear friends. The problem is attach...

!! तीन मूर्तियाँ !!*

1️⃣4️⃣❗0️⃣2️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣6️⃣ *♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️*                 *!! तीन मूर्तियाँ !!*  °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° एक राजा था जिसे शिल्प कला अत्यंत प्रिय थी। वह मूर्तियों की खोज में देश-प्रदेश जाया करता था। इस प्रकार राजा ने कई मूर्तियाँ अपने राज महल में लाकर रखी हुई थी और स्वयं उनकी देख रेख करवाते। सभी मूर्तियों में उन्हें तीन मूर्तियाँ जान से भी ज्यादा प्यारी थी। सभी को पता था कि राजा को उनसे अत्यंत लगाव है।       एक दिन जब एक सेवक इन मूर्तियों की सफाई कर रहा था तब गलती से उसके हाथों से उनमें से एक मूर्ति टूट गई। जब राजा को यह बात पता चली तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने उस सेवक को तुरन्त मृत्युदंड दे दिया। सजा सुनने के बाद सेवक ने तुरन्त अन्य दो मूर्तियों को भी तोड़ दिया। यह देख कर सभी को आश्चर्य हुआ। राजा ने उस सेवक से इसका कारण पूछा, तब उस सेवक ने कहा - "महाराज! क्षमा कीजियेगा, यह मूर्तियाँ मिट्टी की बनी हैं, अत्यंत नाजुक हैं। अमरता का वरदान लेकर तो आई नहीं हैं। आज नहीं तो कल टूट ही जाती अ...

Worth being conscious!

* One phone call. One staircase. One misstep.* Mr. Shashi Tharoor tripped while talking on the phone and walking downstairs is not about clumsiness. It’s about the brain. (Glad to note that Mr Tharoor is doing well) Your brain is terrible at “walking + phone” multitasking. Especially while going downstairs. Why stairs are risky? When you go downstairs, your brain is busy with: ▪️Balance ▪️Depth perception ▪️Foot placement ▪️Split-second corrections Add a phone call → attention shifts → reaction time drops. That’s all it takes. *As a neurologist, I can tell you:* *_Some of the worst head injuries I see come from simple falls, not big accidents._* Please don’t use your phone when: *🚫 Going up or down stairs* *🚫 Crossing roads* *🚫 Walking on uneven surfaces* *🚫 Driving / riding* *_Your brain can focus on movement OR on your phone     Not both safely._* *✅The simplest safety hack* *▪️Pause the call.* *▪️Look at the steps.* *▪️Hold the railing.* *▪️Your brain is too valuab...

अमृत कथा*

* अमृत कथा* *बड़ी ही सुन्दर कथा है,अवश्य पढ़ें..*  एक बार मथुरा के निकट एक गाँव में एक छोटी लड़की रहती थी। वृन्दावन के निकट होने के कारण वहां से बहुत लोग ठाकुर जी के दर्शन को जाते थे। जब वो छोटी बच्ची 5 साल की हुई तो उसके घर वाले बांके बिहारी जी के दर्शन के लिए जा रहे थे। उस समय वाहन बहुत कम थे। उनको दर्शन को जाते देख उस छोटी लड़की ने कहा “पिताजी मुझे भी अपने साथ ठाकुर जी के दर्शन के लिए ले चलो” पिताजी ने कहा बेटा अभी आप छोटे हो इतना चल नहीं पाओगे थोडा बड़ा हो जाओ तब तुम्हें साथ में ले चलेंगे।      कुछ समय बीता जब वो 7 साल की हुई तो फिर घरवालों का किसी कारणवश वृन्दावन जाना हुआ। फिर उस बच्ची ने कहा “पिताजी अब मुझे भी साथ ले चलो ठाकुर जी के दर्शन के लिए।” लेकिन किसी कारणवश वो उसको न ले जा सके। बच्ची के मन में ठाकुर जी के प्रति बहुत प्रगाढ़ प्रेम था। वह बस उनका मन से चिंतन करती रहती थी और दुखी भी होती थी की ठाकुर जी के दर्शन को न जा सकी आज तक। गाँव में उसके सभी सहपाठी प्रभु जी के दर्शन कर चुके थे। जब वो सब ठाकुर जी के मंदिर और उनके रूप का वर्णन करते तो इस बच्ची के मन में दर...

इस संसार में हकीकत में कौन क्या है....✍*

* इस संसार में हकीकत में कौन क्या है....✍*         *👌जानिए हँसमुखी नज़रों से ।* *1 सिनेमा-----* पैसा देकर कैद होने का स्थान । *2 जेल --------* बिना पैसे का होस्टल । *3 सास -------* बहू के पीछे छोडा गया बिना पैसे का जासूस । *4 चिन्ता------* वजन कम करने की सबसे सस्ती दवा । *5 मृत्यु -------* बिना पासपोर्ट के पृथ्वी से दूूर जाने की छूट । *6 ताला -------* बिना वेतन का चौकीदार । *7 मुर्गा --------* देहात की अलार्म घडी । *8 झगडा ------* वकील का कमाऊ बेटा । *9 चश्मा-------* जादुई आँख । *10 स्वप्न ----* बिना पैसे की फिल्म । *11 हॉस्पिटल ---* रोगियों का संग्रहालय । *12 श्मशान --* दुनिया का आखिरी स्टेशन । *13 ईश्वर ------* किसी से मुलाकात न करने वाला एडमिन । *14 चाय कॉफी ---* कलयुग का अमृत । *15 विद्वान ------* अक्ल का ठेकेदार । *16 चोर --------* रात का शरीफ व्यापारी । *17 विश्व --------* एक महान धर्मशाला । और अंत में  *18 फेसबुक और व्हाट्सएप -----* एक लाइलाज नशा , जिसने आपको जकड़ा हुआ है ।              *हँसते रहिये , हँसाते रहिये ।*...

मूंग की विदाई, बेसन की ताजपोशी

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महंगाई की कचौरी: मूंग की विदाई, बेसन की ताजपोशी *सुदर्शन टुडे ब्यूरो बुरहानपुर*  गरीब का व्यंजन  कचौरी खाते ही मूंग दाल की महक मन मस्तिष्क में समा जाती थी वहीं हींग की हल्की सी महक स्वाद को राजशाही बना देती थी। आज की कचौरी में न स्वाद बचा न इसको स्वादिष्ट व्यंजन का जायका देने वाली मूंग की दाल बची न हींग! हाथ ठेले या चाय नाश्ते की दुकानों पर परोसे जाने वाली कचौरी में केवल तेल की भाप और बेसन का आत्मविश्वास ही महसूस होता है। मारवाड़ और मध्य भारत की शान रही कचौरी आज  बुरहानपुर मे अपनी पहचान के साथ स्वाद के संकट से जूझ रही है।  महंगाई की मार है या दुकानदार का निजी स्वार्थ हलवाई ने कचौरी से मूंग दाल को चुपचाप बाहर का रास्ता दिखा दिया  और उसकी जगह चने के बेसन ने स्थायी कब्जा जमा लिया है। मूंग अब कचौरी में नहीं, यादों में भी मुश्किल से मिलती है। हींग, जो कभी कचौरी की आत्मा हुआ करती थी, अब सिर्फ नाम की हींग रह गई है—शायद दुकानदार - हलवाई हींग का फोटो दिखाकर ही काम चला रहे हैं। 3 से 5 रूपये की कचौरी 10 से 15 रुपये की होने के बाद भी स्वाद खोजना पड़ रहा है। स्वा...