यह रचना दिल को छू गई।*
*यह रचना दिल को छू गई।* तीन पहर तो बीत गये, बस एक पहर ही बाकी है। जीवन हाथों से फिसल गया, बस खाली मुट्ठी बाकी है। सब कुछ पाया इस जीवन में, फिर भी इच्छाएं बाकी हैं दुनिया से हमने क्या पाया, यह लेखा - जोखा बहुत हुआ, इस जग ने हमसे क्या पाया, *बस ये गणनाएं बाकी हैं।* इस भाग-दौड़ की दुनिया में हमको इक पल का होश नहीं, वैसे तो जीवन सुखमय है, पर फिर भी क्यों संतोष नहीं ! क्या यूं ही जीवन बीतेगा, क्या य...